लखनऊ/प्रयागराज — उत्तर प्रदेश की राजनीति और ग्रामीण इलाकों की चुनावी हलचल से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आ रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि पंचायत चुनाव अगले तीन महीने के भीतर हर हाल में कराए जाएं। अदालत के इस आदेश के बाद प्रशासनिक महकमे में तेजी आ गई है और अधिकारी चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। पंचायत चुनाव का इंतजार कर रहे ग्रामीण इलाकों के लोगों के लिए यह एक बहुत बड़ा और निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है।
इस पूरे मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार और चुनाव से जुड़े पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक नए चुनाव संपन्न नहीं हो जाते और नई पंचायतों का गठन नहीं होता, तब तक मौजूदा निवर्तमान ग्राम प्रधान ही प्रशासक के रूप में काम संभालते रहेंगे। इससे गांवों के विकास कार्य और रोजमर्रा के प्रशासनिक काम रुकेंगे नहीं और जनता को किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
तीन महीने के भीतर चुनाव कराने की समय सीमा
इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस सख्त निर्देश के बाद अब राज्य निर्वाचन आयोग पर समय पर चुनाव कराने की बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। तीन महीने की यह छोटी अवधि प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन आयोग पहले से ही अंदरूनी तैयारियों में जुटा हुआ था। ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और मतदान केंद्रों के निर्धारण का काम अब बहुत तेजी से पूरा किया जाएगा। राजनीतिक दलों ने भी इस आदेश के बाद अपनी कमर कस ली है और गांवों में बैठकों का दौर शुरू हो गया है।
गांवों की सरकार चुनने के लिए होने वाले इन चुनावों का असर दूर तक दिखाई देता है। जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य, प्रधान और वार्ड सदस्यों के पदों के लिए होने वाले इस चुनाव में हर गांव की नुमाइंदगी तय होती है। पिछले कुछ महीनों से चुनाव टलने की अटकलों पर विराम लगाते हुए अदालत ने साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तय वक्त पर ही पूरा किया जाना चाहिए। इससे ग्रामीण विकास के बजट और योजनाओं के क्रियान्वयन में भी तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
निवर्तमान प्रधानों के हाथ में रहेगी प्रशासनिक कमान
हाईकोर्ट के फैसले में यह एक बेहद अहम पहलू है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसका मतलब यह है कि गांवों में विकास कार्यों की फाइलें अटकेगी नहीं और जरूरी भुगतान या प्रशासनिक फैसले आसानी से लिए जा सकेंगे। कई जानकारों का मानना है कि यदि प्रधानों को प्रशासक न बनाया जाता, तो गांवों का कामकाज पूरी तरह ठप हो सकता था। सरकार और अदालत दोनों ने ही इस व्यावहारिक पहलू को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया है।
अब निगाहें राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के अगले कदमों पर टिकी हैं कि वे किस प्रकार इस तीन महीने के कड़े समय चक्र को पूरा करते हैं। पुलिस प्रशासन को भी शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान कराने के लिए अभी से अपनी रणनीति तैयार करनी होगी। ग्रामीण मतदाता अब अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहे हैं और चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच चुकी है।
राजनीतिक दलों और संभावित उम्मीदवारों की बढ़ी सरगर्मी
अदालत के इस कड़े आदेश के आते ही उत्तर प्रदेश के गांवों में राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी जमीन मजबूत करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय हो गए हैं। संभावित उम्मीदवार और उनके समर्थक अब घर-घर जाकर संपर्क साधने लगे हैं। चुनाव आयोग द्वारा तारीखों की आधिकारिक घोषणा किए जाने से पहले ही जोड़-तोड़ और समीकरणों का दौर शुरू हो चुका है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि ग्रामीण जनता इस बार विकास के मुद्दों को सबसे ऊपर रख रही है। पिछले कार्यकाल के कामों का हिसाब मांगने के लिए आम मतदाता पूरी तरह उत्सुक है। अगले कुछ हफ्तों में चुनावी पारा और ज्यादा चढ़ने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी ने अपनी रफ्तार कई गुना बढ़ा दी है।






