उत्तर प्रदेश की प्राचीन धरोहरों को बचाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम
भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरती कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में अनगिनत अनमोल धरोहरें छिपी हुई हैं। सूबे के सुदूर इलाकों की चट्टानों पर उकेरे गए प्राचीन शैलचित्र और ऐतिहासिक स्मारकों की दीवारों पर बनी भित्ति कलाएं हमारे अतीत की सजीव गवाही देती हैं। समय के थ थपेड़ों और लापरवाही के चलते यह अमूल्य विरासत धीरे-धीरे मिटती जा रही है, जिसे बचाने के लिए अब राज्य सरकार ने कमर कस ली है। इस दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाते हुए कला और संस्कृति के संरक्षण की रूपरेखा तैयार कर ली गई है, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी समृद्ध संस्कृति से रूबरू हो सकेंगी।
इस पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिक जामा पहनाने के लिए हाल ही में राजधानी लखनऊ में एक उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक की अध्यक्षता राज्य के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अमृत अभिजात ने की, जिसमें संस्कृति, पर्यटन और धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रमुख लोग शामिल हुए। इस दौरान नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के वरिष्ठ विशेषज्ञों के साथ मिलकर कार्ययोजना पर गंभीर मंत्रणा की गई। बैठक का मुख्य उद्देश्य इन प्राचीन कलाकृतियों को हमेशा के लिए सुरक्षित करना और उनके संरक्षण में आने वाली बाधाओं को दूर करना था।
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राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अनुभव का मिलेगा पूरा लाभ
जिस संस्थान के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश सरकार इस काम को आगे बढ़ा रही है, उसका इतिहास कला संरक्षण के क्षेत्र में बेहद शानदार रहा है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन काम करने वाला इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र पिछले चार दशकों से भी अधिक समय से दुनिया भर में भित्ति चित्रों और प्राचीन शैलकला के अध्ययन में जुटा हुआ है। इस संस्थान ने केवल देश में ही नहीं, बल्कि फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, इंडोनेशिया, इटली और चीन जैसे देशों में भी कला संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है।
दोनों पक्षों के बीच पहले से हुए एक अहम समझौते के तहत अब जमीनी स्तर पर काम शुरू करने का समय आ गया है। राज्य पुरातत्व विभाग की निदेशक डॉ. रेनू त्रिवेदी ने इस सिलसिले में बताया कि विभाग और राष्ट्रीय कला केंद्र मिलकर पारंपरिक ब्लॉक पेंटिंग और दीवारों पर उकेरी गई कला को आधुनिक तकनीकों के सहारे बचाएंगे। सरकार की कोशिश है कि अत्याधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों का इस्तेमाल कर इन चित्रों की उम्र बढ़ाई जाए और उन्हें नष्ट होने से बचाया जाए।
विंध्य क्षेत्र और बुंदेलखंड से होगी इस महाअभियान की शुरुआत
इस व्यापक संरक्षण अभियान को चरणबद्ध तरीके से पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। शुरुआती योजना के तहत प्रदेश के उन जिलों को चुना गया है जहां प्रागैतिहासिक काल से जुड़े शैलचित्र आज भी मौजूद हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के सुझाव पर पहले चरण में चंदौली, सोनभद्र और मिर्जापुर के पहाड़ी और जंगली इलाकों में फैले शैलचित्र स्थलों का गहन सर्वे किया जाएगा। इन इलाकों की चट्टानों पर बने चित्र हमारी प्राचीन मानव सभ्यता के बड़े प्रमाण माने जाते हैं।
इन तीन जिलों के अलावा मथुरा, अलीगढ़ और बुंदेलखंड क्षेत्र की प्राचीन हवेलियों, मंदिरों और स्मारकों पर बनी वॉल पेंटिंग यानी भित्ति चित्रों का भी विस्तृत रिकॉर्ड तैयार होगा। विशेषज्ञों की टीमें इन सभी जगहों का स्थलीय निरीक्षण करके वर्तमान स्थिति का आकलन करेंगी। जरूरत पड़ने पर चुनिंदा जगहों पर पुरातात्विक उत्खनन का कार्य भी चरणबद्ध ढंग से कराया जाएगा ताकि इतिहास की और भी परतें खुलकर सामने आ सकें।
वैज्ञानिक संरक्षण और विशेषज्ञों की देखरेख में होगा पूरा काम
कलाकृतियों को बचाने का यह काम पूरी तरह से वैज्ञानिक मानकों के आधार पर किया जाएगा। योजना के अनुसार, 15वीं से लेकर 19वीं शताब्दी तक की प्राचीन चित्रकलाओं के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सचिव और कला केंद्र के प्रमुख को औपचारिक पत्र भेजकर तकनीकी सहयोग और बजट का प्रस्ताव रखा जाएगा। इसके बाद मंत्रिमंडल के समक्ष वार्षिक कार्ययोजना पेश करके विधिवत वित्तीय स्वीकृति ली जाएगी।
इस पूरी प्रक्रिया पर बात करते हुए एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने कहा,
"हमारी प्राचीन कला और संस्कृति केवल ईंट-पत्थरों तक सीमित नहीं है, बल्कि चट्टानों और दीवारों पर उकेरे गए ये चित्र हमारे पूर्वजों की बौद्धिक संपदा हैं। इन्हें सहेजना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है, और इसके लिए आधुनिक विज्ञान का पूरा उपयोग किया जाएगा।"— अमृत अभिजात, प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी
कारीगरों और तकनीशियनों के लिए विशेष कार्यशालाओं का आयोजन
किसी भी ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण में जरा सी चूक उसे हमेशा के लिए मिटा सकती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने यह तय किया है कि फील्ड वर्क शुरू होने से पहले एक विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की जाएगी। इस कार्यशाला में राज्य पुरातत्व विभाग के तकनीकी अधिकारियों के साथ-साथ मैदान में काम करने वाले स्थानीय कारीगरों और तकनीकी सहायकों को भी प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे प्राचीन चित्रों की नाजुक बनावट को बिना नुकसान पहुंचाए उनका रखरखाव कर सकें।
इस अभियान के जरिए न केवल ऐतिहासिक धरोहरों का जनपदवार डिजिटल और भौतिक अभिलेखन तैयार होगा, बल्कि आने वाले समय में इन सांस्कृतिक धरोहरों को पर्यटन के नक्शे पर भी एक नई पहचान मिलेगी। प्रदेश सरकार के इस कदम से इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन के नए रास्ते खुलेंगे और उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत वैश्विक पटल पर एक बार फिर चमक उठेगी।



