नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के चुनावी ढांचे में एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक फेरबदल शुरू हो गया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित कुल 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची को नए सिरे से अपडेट करने का निर्देश चुनाव आयोग ने जारी कर दिया है। यह पूरा मामला एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया से जुड़ा है, जिस पर पिछले कुछ हफ्तों से लगातार राजनीतिक और कानूनी घमासान मचा हुआ है। आम चुनाव के बाद वोटर लिस्ट को त्रुटिमुक्त बनाने की इस कवायद को बहुत संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि इसमें लाखों मतदाताओं के नाम जुड़ने और कटने की प्रक्रिया शामिल होती है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तब नया मोड़ आ गया जब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के कामकाज और नियमों पर कड़ी आपत्ति जताई। मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि चुनाव आयोग ने कानून के दायरे से बाहर जाकर कोई भी काम किया, तो उनके फैसलों पर तुरंत रोक लगा दी जाएगी। अदालत ने फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को अपनी मंजूरी देने से साफ इनकार कर दिया है। फॉर्म-6 वह जरूरी दस्तावेज होता है जिसके जरिए देश का कोई भी नया नागरिक वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करता है। इस कानूनी पेंच के बाद अब चुनाव आयोग और न्यायपालिका के बीच का यह टकराव सीधे तौर पर आम जनता के अधिकारों से जुड़ गया है।
एसआईआर विवाद और नाम कटने पर घर-घर जाएंगे अधिकारी
मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नाम कटने की शिकायतों को लेकर देश भर में भारी नाराजगी देखने को मिली थी। आम जनता और विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बाद अब चुनाव आयोग ने एक नया और सुधारात्मक फैसला लिया है। नए निर्देश के मुताबिक, यदि किसी भी मतदाता का नाम एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सूची से बाहर होता है, तो संबंधित सरकारी अफसर सीधे उस मतदाता के घर जाएंगे। घर जाकर अधिकारी खुद वैध दस्तावेज एकत्र करेंगे ताकि किसी भी पात्र नागरिक का नाम गलती से सूची से बाहर न रह जाए। अब तक देश के करीब 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस तरह की जमीनी जांच के आदेश दिए जा चुके हैं।
जमीनी स्तर पर काम कर रहे बूथ लेवल अफसरों यानी बीएलओ पर इस समय काम का भारी दबाव बना हुआ है। चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि यह पूरा अभियान पूरी तरह पारदर्शी तरीके से चलाया जा रहा है। आयोग की तरफ से यह भी सफाई दी गई है कि जितने भी बड़े नीतिगत फैसले लिए गए हैं, वे सभी पूरी तरह सर्वसम्मति से हुए हैं। वोटरों के नाम हटाने से लेकर फॉर्म-6 के प्रावधानों और डिजिटल डेटाबेस तैयार करने तक हर कदम पर कानून का पूरा पालन किया जा रहा है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण और शहरी इलाकों के आम लोग अपने दस्तावेजों को लेकर खासे परेशान नजर आ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और आयोग की नई कार्ययोजना
देश की सर्वोच्च अदालत की कड़ी टिप्पणियों के बाद चुनाव आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में कुछ अहम बदलाव किए हैं। आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आगामी चुनावों से पहले वोटर लिस्ट एकदम साफ और त्रुटिरहित हो। जिन 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह विशेष अपडेट अभियान चलाया जा रहा है, वहां के जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए गए हैं। अधिकारियों से कहा गया है कि वे किसी भी सूरत में पात्र मतदाताओं के अधिकारों का हनन न होने दें। यदि किसी का नाम गलती से कटता है, तो उसकी जिम्मेदारी सीधे स्थानीय प्रशासन की होगी।
आम नागरिकों के लिए यह दौर दस्तावेजों की भागदौड़ भरा साबित हो रहा है। वोटर आईडी कार्ड से लेकर आधार और पते के प्रमाण जुटाने के लिए लोग तहसीलों और निर्वाचन कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब कई इलाकों का दौरा किया, तो यह बात सामने आई कि जागरूकता की कमी के कारण आम आदमी असमंजस में है। कई जगहों पर लोगों को यह तक नहीं पता कि उनका नाम सूची में सुरक्षित है या नहीं। प्रशासन अब कैंप लगाकर लोगों को जागरूक करने का दावा कर रहा है, लेकिन धरातल पर तस्वीर अभी भी धीमी गति से चल रही है।
राजनीतिक सरगर्मी और पारदर्शी चुनावी प्रक्रिया की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी तीखी आ रही हैं। विपक्षी दल लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि एसआईआर प्रक्रिया के नाम पर चुनिंदा इलाकों के वोटरों को निशाना बनाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष और प्रशासनिक मशीनरी का यह तर्क है कि फर्जी मतदाताओं को हटाने के लिए यह सफाई अभियान बेहद जरूरी है। चुनाव आयोग के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह साबित करना है कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और राजनीतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त है।
जैसे-जैसे इन 17 राज्यों में वोटर लिस्ट अपडेट का काम आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे कानूनी और प्रशासनिक निगाहें इस पर टिकी रहेंगी। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर भी पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं कि अदालत इस पूरी प्रक्रिया को लेकर क्या अंतिम रुख अपनाती है। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट से यह साफ होता है कि तकनीक, कानून और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के इस त्रिकोण में आम मतदाता का अधिकार सबसे ऊपर होना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग जनता के भरोसे को किस प्रकार कायम रख पाता है।










