साओ पाउलो/ब्राजीलिया: 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड ग्लोबल डेस्क से विशेष रिपोर्ट। दक्षिण अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ब्राजील में राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। हालिया राष्ट्रपति चुनावों के पहले चरण के जो रुझान और नतीजे सामने आए हैं, उन्होंने स्थापित राजनीतिक समीकरणों को हिलाकर रख दिया है। मौजूदा वामपंथी राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला दा सिल्वा (Lula da Silva) के सामने अबकी बार दक्षिणपंथी खेमे से बेहद कड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। खास तौर पर पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के परिवार का राजनीतिक रसूख एक बार फिर मजबूती से उभरकर सामने आया है, जहां उनके बेटे ने सीधे मुकाबले में लूला को कड़ी टक्कर देते हुए बढ़त बना ली है।
कड़े मुकाबले ने तय किया 25 अक्टूबर का 'रनऑफ'
चुनाव आयोग से मिल रहे आधिकारिक आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुरुआती दौर की गिनती में किसी भी उम्मीदवार को स्पष्ट बहुमत (50% से अधिक वोट) हासिल नहीं हो सका है। यही वजह है कि ब्राजीलियाई संविधान के अनुसार, अब चुनाव का फैसला 25 अक्टूबर को होने वाले दूसरे दौर यानी 'रनऑफ' (Run-off) मुकाबले से होगा। इस स्थिति ने देश के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी तेज कर दी है और दोनों ही खेमे अपनी पूरी ताकत झोंकने को मजबूर हो गए हैं।
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बोल्सोनारो फैक्टर: परिवार की राजनीतिक वापसी
विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणपंथी राजनीति के मुख्य चेहरे रहे जायर बोल्सोनारो के प्रतिबंधित या हाशिए पर होने के बावजूद, उनके परिवार (विशेषकर उनके बेटे फ्लावियो बोल्सोनारो) का इस तरह से मजबूत उभरना यह साबित करता है कि ब्राजील की जनता का एक बड़ा हिस्सा अभी भी अनुदारवादी और दक्षिणपंथी नीतियों के पक्ष में खड़ा है। मतदाताओं के बीच बढ़ती महंगाई, अर्थव्यवस्था की सुस्त चाल और लूला प्रशासन की नीतियों को लेकर उपजा असंतोष इस बदलाव की मुख्य वजह बताया जा रहा है।
लूला की मुश्किलें बढ़ीं, रणनीतिक बदलाव की जरूरत
दूसरी ओर, वामपंथी धड़े के दिग्गज नेता और मौजूदा राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा के लिए यह परिणाम किसी झटके से कम नहीं है। पहले दौर में ही जीत दर्ज करने का उनका दावा कमजोर पड़ गया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लूला को अब मध्यम वर्ग और ग्रामीण इलाकों के उन मतदाताओं को साधना होगा, जो इस बार बदलाव के मूड में नजर आ रहे हैं। 25 अक्टूबर तक का यह सफर ब्राजील के भविष्य के वैचारिक रुख को तय करेगा।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक बाजार पर असर
ब्राजील की इस चुनावी जंग का असर केवल दक्षिण अमेरिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव वैश्विक राजनीति, पर्यावरण नीतियों (विशेषकर अमेज़न वर्षावनों के संरक्षण) और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों पर भी पड़ेगा। अमेरिकी महाद्वीप की इस महाशक्ति में सत्ता किसके हाथ जाएगी, यह आने वाले कुछ हफ्तों के कड़े प्रचार अभियान और बहसों से तय होगा। 'द फ्रीलान्स' इस महामुकाबले की पल-पल की ग्राउंड अपडेट आप तक पहुंचाता रहेगा।









