राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पूर्वी हिस्से से एक बेहद दिल दहला देने वाली खबर सामने आ रही है। दिल्ली के सीमापुरी इलाके में मंगलवार को अचानक एक पांच मंजिला पुरानी और जर्जर इमारत मलबे में तब्दील हो गई। इमारत के भरभराकर गिरने से आसपास के इलाके में भारी अफरा-तफरी मच गई और चीख-पुकार गूंज उठी। इस भीषण हादसे में एक गर्भवती महिला और एक मासूम बच्चे समेत तीन लोगों की मौके पर ही जान चली गई। स्थानीय लोगों और प्रशासन की शुरुआती मदद से कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, लेकिन मलबे में दबे अन्य लोगों की तलाश के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन अब भी जारी है।
घटना की जानकारी मिलते ही दिल्ली पुलिस, दमकल विभाग और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल की टीमें तुरंत मौके पर पहुंच गईं। प्रशासन के बड़े अधिकारी भी घटनास्थल पर डेरा डाले हुए हैं ताकि राहत कार्यों में कोई देरी न हो। मलबे के नीचे दबे लोगों को निकालने के लिए कटर और जेसीबी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अब तक की शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, इस हादसे में कम से कम आठ से ग्यारह लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिन्हें नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों के अनुसार, कुछ घायलों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है, जिससे मरने वालों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
सीमापुरी हादसे में प्रशासन की नाकामी और जर्जर इमारतों का सच
यह दर्दनाक हादसा कोई पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि पुरानी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में ऐसी जर्जर इमारतें मौत का सामान बनकर खड़ी हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इस पांच मंजिला इमारत की हालत लंबे समय से बहुत ज्यादा खराब थी और इसके झुकने की शिकायत भी पहले की गई थी। इसके बावजूद समय रहते नगर निगम या स्थानीय प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। समय पर नोटिस न देना और अवैध निर्माण पर रोक न लगाना इन बड़े हादसों की सबसे बड़ी वजह बनता जा रहा है। लोग अपने घरों में डर के साये में जीने को मजबूर हैं, लेकिन प्रशासन की नींद तब खुलती है जब कोई बड़ा जानलेवा हादसा हो जाता है।
हादसे के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। स्थानीय लोगों में प्रशासन के प्रति भारी गुस्सा देखा जा रहा है। उनका कहना है कि अगर समय रहते इस जर्जर मकान को खाली करा लिया जाता या इसकी मरम्मत कराई जाती, तो इतनी कीमती जानें नहीं जातीं। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी अब यह जांच कर रहे हैं कि इमारत में कितने परिवार रह रहे थे और क्या यह निर्माण पूरी तरह अवैध था। घायलों के परिजनों को सांत्वना देने के लिए नेता और अधिकारी भी अस्पताल पहुंच रहे हैं, लेकिन हर बार की तरह इस बार भी सवाल वही है कि गरीबों की जान की कीमत कौन चुकाएगा।
राहत और बचाव कार्य की जमीनी हकीकत
घटनास्थल पर मलबे को हटाने का काम युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा है ताकि अगर कोई और व्यक्ति अंदर फंसा हो, तो उसे तुरंत बचाया जा सके। अंधेरा होने के बावजूद लाइटें लगाकर सर्च ऑपरेशन लगातार जारी है। खोजी कुत्तों की मदद भी ली जा रही है ताकि मलबे के नीचे दबे लोगों की सटीक लोकेशन का पता लगाया जा सके। दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल कार्यालय भी इस पूरे हादसे पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और मृतकों के परिजनों को उचित मुआवजा देने की घोषणा की जा सकती है। हालांकि, मुआवजा किसी भी परिवार के खोए हुए सदस्य को वापस नहीं ला सकता, इसलिए भविष्य के लिए कड़े कदम उठाने की सख्त जरूरत है।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब मौके का जायजा लिया, तो पता चला कि सीमापुरी और आसपास के घनी आबादी वाले इलाकों में ऐसी सैकड़ों इमारतें हैं जो बिना किसी प्लानिंग के खड़ी हैं। यहां न तो फायर ब्रिगेड की गाड़ियां जाने का रास्ता है और न ही मजबूत नींव वाले मकान बनाए गए हैं। इस हादसे ने एक बार फिर दिल्ली के शहरी बुनियादी ढांचे और सुरक्षा मानकों की पोल खोल कर रख दी है। यदि समय रहते दिल्ली नगर निगम ने शहर भर की जर्जर इमारतों का सर्वे करके उन्हें गिराने या सील करने का अभियान नहीं चलाया, तो आने वाले दिनों में ऐसी और भी दर्दनाक तस्वीरें देखने को मिल सकती हैं।
भविष्य के लिए सबक और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
सीमापुरी इमारत ढहने की इस घटना ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। अब यह जरूरी हो गया है कि सभी स्थानीय निकाय अपने-अपने क्षेत्रों में मानसून या सामान्य दिनों में भी जर्जर मकानों की एक सूची तैयार करें। मकान मालिकों पर कार्रवाई करने के साथ-साथ वहां रहने वाले बेसहारा और गरीब किराएदारों को सुरक्षित स्थान पर बसाने की वैकल्पिक व्यवस्था भी करनी होगी। सिर्फ हादसे के बाद मुआवजे का ऐलान कर देना और खानापूर्ति कर देना प्रशासनिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने जैसा है। जनता अब सिर्फ वादों पर भरोसा करने को तैयार नहीं है, उसे जमीनी स्तर पर ठोस बदलाव और सुरक्षा की गारंटी चाहिए।



