नई दिल्ली/मुंबई: 'द फ्रीलान्स' की ऑन-द-ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन के अनुसार, देश की चुनावी राजनीति में इस समय भूचाल आया हुआ है। एक तरफ जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मुखर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग (EC) ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा और राहत भरा कदम उठाया है। हमारी जमीनी पड़ताल बताती है कि मुंबई और दिल्ली से लेकर देश के कई अन्य हिस्सों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं, जिसके जवाब में आयोग ने अपनी रणनीति में फेरबदल करते हुए छूटे हुए मतदाताओं को एक और मौका देने की घोषणा की है।
मुंबई और दिल्ली में सड़कों पर उबाल, 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें' की उठी मांग
राजधानी दिल्ली और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक और सामाजिक संगठनों का पारा सातवें आसमान पर है। सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) जैसे संगठनों और विपक्षी दलों द्वारा लगातार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए गए हैं, जिससे लोकतांत्रिक अधिकार छिन रहे हैं। सीजेपी के नेतृत्व में मुंबई में हुए प्रदर्शन और कांग्रेस पार्टी द्वारा देशव्यापी विरोध के ऐलान ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय फलक पर ला खड़ा किया है। हर चौक-चौराहे पर 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें' के नारे गूंज रहे हैं।
संबंधित खबरें
चुनाव आयोग का बड़ा यू-टर्न: SIR से छूटे लोगों को फिर मिलेगा मौका
बढ़ते राजनीतिक दबाव और चौतरफा घिरने के बाद चुनाव आयोग ने आखिरकार बैकफुट पर आते हुए एक महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला लिया है। आयोग के सूत्रों और हालिया बैठकों से सामने आए तथ्यों के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया में जो मतदाता किन्हीं कारणों से अपना पंजीकरण नहीं करा पाए थे या सूची से बाहर हो गए थे, उन्हें अब अपनी बात रखने और नाम जुड़वाने का दोबारा अवसर दिया जाएगा। इस फैसले को चुनाव आयोग की ओर से डैमेज कंट्रोल के रूप में देखा जा रहा है, ताकि निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों को शांत किया जा सके।
कैबिनेट सचिव को लिखे पत्र पर सफाई और आंतरिक बैठकों का दौर
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, हाल ही में कैबिनेट सचिव को लिखे गए एक आधिकारिक पत्र को लेकर भी सियासी गलियारों में काफी सुगबुगाहट रही है। 'द फ्रीलान्स' के पास मौजूद जानकारी के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर चली मैराथन बैठकों में इस बात पर मंथन हुआ कि कैसे प्रशासनिक मशीनरी और जनता के बीच की खाई को पाटा जाए। आयोग ने पत्र से जुड़े विवाद पर अपनी सफाई पेश करते हुए स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है, लेकिन मतदाता सूची की पवित्रता से समझौता नहीं किया जाएगा।
विपक्ष का आक्रामक रुख और कांग्रेस का देशव्यापी आंदोलन
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस पूरे मामले को लेकर सरकार और चुनाव आयोग दोनों पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेतृत्व ने ऐलान किया है कि एसआईआर विवाद और मुख्य चुनाव आयुक्त के रवैये के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाया जाएगा। विपक्षी दलों का तर्क है कि यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करने का प्रयास है।
भविष्य का असर: चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर टिकी निगाहें
यह पूरा विवाद भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। एक तरफ जहाँ चुनाव आयोग ने छूटे हुए लोगों को मौका देकर स्थिति को संभालने की कोशिश की है, वहीं दूसरी तरफ सड़कों पर उतर चुके राजनीतिक दल और नागरिक संगठन किसी भी सूरत में झुकने को तैयार नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या आयोग का यह नया फैसला विरोध की आग को शांत कर पाता है या फिर चुनावी गहमागमी और अधिक तीव्र होती है। 'द फ्रीलान्स' इस पूरी खबर पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा।








