वैश्विक स्तर पर गहराता ईंधन संकट और आम आदमी की मुश्किलें
आज के दौर में ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। लेकिन वर्तमान समय में दुनिया के कई ताकतवर और विकसित देश एक गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों में डीजल की कीमतों ने ऐतिहासिक रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। ईंधन की इस बेतहाशा बढ़ोतरी और भारी किल्लत के कारण आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि हर नौवां पेट्रोल पंप या तो पूरी तरह सूख चुका है या फिर वहां ईंधन की आपूर्ति बाधित होने के कारण ताले लटक गए हैं। इस संकट ने न केवल वाहन चालकों की मुश्किलें बढ़ाई हैं, बल्कि परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को भी गहरे संकट में डाल दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्थिति पर जल्द नियंत्रण नहीं पाया गया, तो इसके परिणाम पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकते हैं। डीजल का इस्तेमाल केवल गाड़ियों में ही नहीं, बल्कि भारी ट्रकों, मालवाहक जहाजों, कृषि उपकरणों और उद्योगों में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में डीजल के दाम बढ़ने और उसकी उपलब्धता कम होने से हर वस्तु की ढुलाई महंगी हो रही है, जिससे अंततः महंगाई का बोझ आम जनता की जेब पर पड़ रहा है।
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अमेरिका से लेकर यूरोप तक क्यों मची है डीजल की हाहाकार?
अमेरिका और यूरोपीय देशों में डीजल की यह किल्लत रातों-रात पैदा नहीं हुई है। इसके पीछे कई भू-राजनीतिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के देशों में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल के वैश्विक बाजार में लंबे समय से अस्थिरता बनी हुई है। इसके अलावा, रिफाइनरी क्षमता में कमी और पर्यावरण नियमों के चलते जीवाश्म ईंधन के उत्पादन पर कसता शिकंजा भी इस संकट का एक बड़ा कारण है। यूरोप ने जब से रूसी ऊर्जा उत्पादों पर प्रतिबंध लगाए हैं, तब से वहां ईंधन का संतुलन बिगड़ गया है.
फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों में रिफाइनरियों के कर्मचारियों की हड़ताल ने इस आग में घी डालने का काम किया है। जब उत्पादन इकाइयां ही बंद हो जाएंगी, तो बाजार में ईंधन की आपूर्ति कैसे सुचारू रह सकती है? यही कारण है कि पश्चिमी देशों के बड़े महानगरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक पेट्रोल और डीजल के लिए लंबी-लंबी कतारें देखी जा रही हैं। सरकारें हालात संभालने के लिए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों (Strategic Reserves) का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन वह उपाय भी नाकाफी साबित हो रहा है।
हर नौवां पेट्रोल पंप क्यों पड़ा है सूखा?
इस संकट का सबसे डरावना पहलू यह है कि आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) बुरी तरह चरमरा गई है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका और यूरोप के कई हिस्सों में हर नौवां पेट्रोल पंप ऐसा है जहां डीजल का एक बूंद स्टॉक नहीं बचा है। पंप संचालकों का कहना है कि उन्हें समय पर ईंधन की डिलीवरी नहीं मिल पा रही है। थोक विक्रेता और डिपो मालिक खुद ईंधन की भारी कमी से जूझ रहे हैं। इसके चलते पंप मालिकों को मजबूरन अपने पंप बंद रखने पड़ रहे हैं।
इस स्थिति का सबसे बुरा असर उन ट्रक ड्राइवरों और ट्रांसपोर्टरों पर पड़ रहा है, जिनका पूरा रोजगार सड़क परिवहन पर निर्भर है। कई जगहों पर ड्राइवरों को ईंधन पाने के लिए मीलों दूर के पंपों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों और उसकी अनुपलब्धता के कारण परिवहन लागत कई गुना बढ़ गई है, जिससे खाने-पीने की जरूरी चीजों से लेकर औद्योगिक सामानों तक के दाम आसमान छूने लगे हैं।
"वैश्विक ऊर्जा बाजार इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां आपूर्ति और मांग के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। यदि उत्पादन में तुरंत वृद्धि नहीं की गई, तो विकसित देशों के साथ-साथ विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा।"— ऊर्जा बाजार विशेषज्ञ, ब्लूमबर्ग
परिवहन और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर मंडराया बड़ा खतरा
डีゼル (Diesel) को आधुनिक अर्थव्यवस्था का 'लाइफलाइन' कहा जाता है। दुनिया भर में सामानों की आवाजाही का 80 प्रतिशत हिस्सा डीजल से चलने वाले ट्रकों और मालवाहक वाहनों के जरिए होता है। जब डीजल ही उपलब्ध नहीं होगा या इतना महंगा हो जाएगा कि ट्रांसपोर्टर उसे खरीद न सकें, तो पूरी अर्थव्यवस्था का पहिया थमना तय है। ब्रिटेन और फ्रांस में इस संकट की वजह से सुपरमार्केट्स की शेल्फें खाली होने लगी हैं, क्योंकि समय पर सामानों की डिलीवरी नहीं हो पा रही है।
कृषि क्षेत्र पर भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और सिंचाई के पंप सेट डीजल से चलते हैं। फसल की कटाई और बुवाई के इस सीजन में यदि किसानों को पर्याप्त डीजल नहीं मिला, तो खाद्यान्न उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। दुनिया भर के किसान संगठन सरकारों से मांग कर रहे हैं कि उन्हें रियाइती दरों पर और प्राथमिकता के आधार पर ईंधन उपलब्ध कराया जाए, ताकि खाद्य सुरक्षा पर कोई संकट न आए।
आगे क्या होगी स्थिति और इससे कैसे निपटा जा सकता है?
इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। ओपेक (OPEC) देशों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है कि वे कच्चे तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करें ताकि रिफाइनरियों को पर्याप्त कच्चा माल मिल सके। इसके अलावा, कई देश इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ने की बात कह रहे हैं, लेकिन यह रातों-रात संभव नहीं है। जब तक पारंपरिक ऊर्जा पर निर्भरता कम नहीं होती, तब तक इस तरह के संकट बार-बार सिर उठा सकते हैं।
आम जनता के लिए आने वाले कुछ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। महंगाई पर लगाम कसने के लिए सरकारों को टैक्स में कटौती जैसे कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं। भारत और अन्य एशियाई देशों को भी इस वैश्विक उथल-पुथल पर पैनी नजर रखनी होगी, ताकि इसका असर घरेलू बाजार और आम आदमी की जेब पर कम से कम पड़े।





