बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में शुमार 'मुख्यमंत्री नल-जल योजना' ग्रामीण इलाकों में शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए लाई गई थी। सरकार का मकसद था कि राज्य के हर घर तक नल का साफ पानी पहुंचे, ताकि महिलाओं और बच्चों को दूर-दराज के इलाकों से पानी ढोने की मुसीबत से निजात मिल सके। लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। नवादा जिले के कौआकोल प्रखंड क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली मंझिला पंचायत के वार्ड संख्या 9 में यह योजना भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। यहां पिछले डेढ़ साल से नल-जल योजना पूरी तरह ठप पड़ी है और ग्रामीण एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।
डेढ़ साल से ठप पड़ी है जलापूर्ति व्यवस्था
मंझिला पंचायत के वार्ड संख्या 9 के स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके इलाके में बिछाई गई पाइपलाइन और घरों के बाहर लगाए गए नल लंबे समय से सूखे पड़े हैं। इस योजना के शुरू होने पर ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें चापाकल या कुएं का गंदा पानी नहीं पीना पड़ेगा। कुछ दिनों तक योजना ठीक-ठाक चली भी, लेकिन उसके बाद तकनीकी खराबी और मेंटेनेंस के अभाव में पानी की सप्लाई पूरी तरह बंद हो गई। देखते-देखते डेढ़ साल का लंबा वक्त बीत गया, लेकिन आज तक किसी भी जिम्मेदार ने इस बात की सुध नहीं ली कि योजना बंद क्यों है और इसे दोबारा कब चालू किया जाएगा।
ग्रामीणों के अनुसार, योजना के तहत जो पाइपलाइन जमीन के अंदर और बाहर बिछाई गई थी, वह अब देखरेख के अभाव में क्षतिग्रस्त होने लगी है। कई जगहों पर नल टूट चुके हैं या गायब हो चुके हैं। जिन लोगों के घरों के बाहर नल लगाए गए थे, वे अब केवल सजावट की वस्तु बनकर रह गए हैं। हालात यह हैं कि करोड़ों रुपये की सरकारी लागत से बनी यह योजना केवल कागजों पर चल रही है, जबकि जमीन पर इसका कोई भी फायदा आम जनता को नहीं मिल रहा है।
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पेयजल के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भरता मजबूरी
पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए महीनों से संघर्ष कर रहे ग्रामीणों की मुश्किलें गर्मी के दिनों में और ज्यादा बढ़ जाती हैं। जब चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी पड़ती है, तब इलाके के पुराने चापाकल भी दम तोड़ने लगते हैं। ऐसे में लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए दूरदराज के इलाकों या निजी बोरिंगों का सहारा लेना पड़ता है। महिलाओं को रोज सुबह-शाम सिर पर पानी के बर्तन रखकर दूर से पानी ढोना पड़ता है, जिससे उनके घरेलू कामकाज के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ता है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब इस योजना का शिलान्यास और उद्घाटन हुआ था, तब बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि अब हर घर में शुद्ध जल पहुंचेगा। लेकिन आज विडंबना देखिए कि विभाग की उदासीनता के कारण लोग गंदा या दूर से लाया हुआ पानी पीने को मजबूर हैं। इलाके के बुजुर्गों और युवाओं दोनों में ही इस बात को लेकर भारी गुस्सा है कि सरकारी खजाने से पैसा खर्च होने के बावजूद उन्हें बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं।
"सरकार और प्रशासन ने हमारे गांव को भगवान भरोसे छोड़ दिया है। पिछले डेढ़ साल से हमारे वार्ड में एक बूंद पानी नल से नहीं आया है। कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। क्या गरीब होना गुनाह है?" — स्थानीय ग्रामीण, मंझिला पंचायत
अधिकारियों की उदासीनता और जनप्रितिनिधियों की चुप्पी
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल संबंधित विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर उठता है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार पंचायत के नुमाइंदों से लेकर प्रखंड स्तर के अधिकारियों तक अपनी लिखित और मौखिक शिकायत पहुंचाई। हर बार उन्हें सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले, लेकिन धरातल पर काम करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। किसी भी अधिकारी ने यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर इतनी बड़ी योजना क्यों ठप पड़ी है और इसे ठीक करने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि इस तरह की लापरवाही से साफ जाहिर होता है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के बाद उनकी मॉनिटरिंग करने वाला कोई सिस्टम मजबूत नहीं है। ठेकेदार और विभाग के लोग काम पूरा दिखाकर अपनी खानापूर्ति कर लेते हैं, और असली परेशानी आम जनता को भुगतनी पड़ती है। यदि समय रहते इस दिशा में ध्यान दिया जाता, तो शायद आज यह नौबत नहीं आती।
जिला प्रशासन से उच्चस्तरीय जांच की मांग
लंबे समय से चली आ रही इस पानी की किल्लत से तंग आकर अब ग्रामीणों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने जिला प्रशासन और जनशिकायत प्रकोष्ठ को ज्ञापन सौंपकर इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। ग्रामीणों की मांग है कि न सिर्फ इस बंद पड़े नल-जल प्रोजेक्ट को तुरंत प्रभाव से चालू कराया जाए, बल्कि पिछले डेढ़ साल से पानी सप्लाई नहीं होने के पीछे की गड़बड़ी की भी जांच हो।
ग्रामीणों का साफ कहना है कि अगर जल्द ही प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो वे प्रखंड कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन करने के लिए बाध्य होंगे। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर ग्रामीण विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत और सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन की नींद कब खुलती है और कब तक इस इलाके के प्यासे लोगों को उनके हिस्से का शुद्ध पानी मिल पाता है।

