बर्लिन/नई दिल्ली — यूरोप की राजनीति में इन दिनों हवा का रुख पूरी तरह बदल गया है। जर्मनी समेत कई बड़े यूरोपीय देशों में आम नागरिकों के लिए सिर पर छत बचाना सबसे बड़ा संकट बन गया है। इसी गंभीर हाउसिंग संकट को भुनाते हुए वामपंथी पार्टियों ने एक नया राजनीतिक दांव खेला है। बर्लिन में हाल ही में हुए चुनावों और राजनीतिक बदलावों में वाम दलों ने सस्ते घर और कम किराए के मुद्दे को सबसे ऊपर रखा। इसका नतीजा यह हुआ कि दशकों से हाशिए पर चल रही वामपंथी राजनीति को अचानक से नई ताकत मिल गई है और मुख्यधारा की पार्टियां भी अब मजबूर होकर इस मुद्दे पर बात कर रही हैं।
बढ़ती महंगाई के इस दौर में यूरोप के बड़े शहरों में किराएदारों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सामान्य नौकरियां करने वाले लोगों के लिए बड़े शहरों में घर का किराया देना अब नामुमकिन सा होता जा रहा है। घर के मालिकों और बड़ी कंपनियों द्वारा लगातार बढ़ाए जा रहे किराए के खिलाफ आम जनता में भारी गुस्सा देखा जा रहा था। वामपंथी दलों ने इस छिपे हुए असंतोष को भांप लिया और घर के अधिकार को बुनियादी मानवाधिकार के रूप में पेश किया। उन्होंने हर नागरिक के लिए सस्ते और पक्के मकान की गारंटी का वादा किया, जो शहरी इलाकों के मतदाताओं को सीधे तौर पर छू गया।
जर्मनी और बर्लिन में कैसे पलटी राजनीति की बाजी
जर्मनी की राजधानी बर्लिन में इस बदलाव की सबसे साफ तस्वीर देखने को मिली है। बर्लिन में लंबे समय से रियल एस्टेट बाजार में बेकाबू तेजी चल रही थी, जिससे आम आदमी का बजट पूरी तरह बिगड़ गया था। वामपंथी पार्टियों ने इस चुनाव में बड़े घर मालिकों और कंपनियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने मांग उठाई कि शहर के बड़े मकानों को सरकारी कब्जे में लिया जाए या किराए पर सख्त नियंत्रण लगाया जाए। इस नारे ने शहर के मध्यम वर्ग और युवाओं को अपनी ओर खींच लिया। चुनावी नतीजों में इसका बड़ा असर दिखा और वाम दलों ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करके सभी को चौंका दिया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूरोप के दूसरे देशों में भी अब यही फॉर्मूला अपनाया जा रहा है। फ्रांस, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों के राजनीतिक दल भी अब समझ चुके हैं कि विदेश नीति या बड़े आर्थिक आंकड़ों से ज्यादा आम वोटर के लिए उसकी रसोई और उसका घर मायने रखता है। जब तक आम आदमी को रहने के लिए सस्ती जगह नहीं मिलेगी, तब तक कोई भी सरकार सुरक्षित नहीं रह सकती है। बर्लिन की इस जीत ने पूरे यूरोप के वामपंथी संगठनों को एक नया रास्ता दिखा दिया है। अब हर जगह चुनावी वादों के केंद्र में सस्ता मकान और कम किराया ही मुख्य मुद्दा बनता जा रहा है।
हाउसिंग संकट से जूझते यूरोप के सामने नई चुनौतियां
वामपंथी दलों की इस जीत के बाद अब सरकारों के सामने असली चुनौती इन वादों को जमीन पर उतारने की है। चुनाव जीतने के बाद इन दलों पर जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का भारी दबाव है। शहर में नए घरों का निर्माण करना और किराए पर तुरंत रोक लगाना इतना आसान काम नहीं है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन और बड़ी रियल एस्टेट कंपनियों के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि किराए पर बहुत ज्यादा कानूनी पाबंदियां लगाई गईं, तो नए घरों का निर्माण कार्य रुक सकता है, जिससे संकट और भी ज्यादा गहरा सकता है।
जमीन पर स्थिति यह है कि आम लोग अभी भी भारी-भरकम किराए के बोझ तले दबे हुए हैं। वामपंथी नेताओं की जीत ने लोगों को एक उम्मीद तो जरूर दी है, लेकिन उनके जीवन में राहत आने में अभी वक्त लगेगा। बर्लिन के इन चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि अगर राजनीतिक दल जनता के असली और बुनियादी मुद्दों को उठाएंगे, तो मतदाता उनका पूरा साथ देंगे। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि आने वाले समय में यूरोप के अन्य चुनावों में भी महंगाई, रोजगार और खासकर सस्ता घर ही सबसे बड़े एजेंडे रहने वाले हैं।




