नई दिल्ली के जंतर-मंतर को देश में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ समय से यहां आवाज उठाने वालों को रोकने के लिए प्रशासन द्वारा अनुमति के कड़े नियम लागू किए जा रहे हैं। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के अनुसार, आम नागरिकों, किसानों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। कई बार अंतिम समय में प्रदर्शन की इजाजत रद्द कर दी जाती है। मीडिया रिपोर्ट्स में इस स्थिति को इजाज़त का गणतंत्र करार दिया गया है, जहां बिना अनुमति के किसी भी प्रकार के प्रतिरोध को पूरी तरह अवैध मान लिया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विरोध करने का अधिकार हमारे संविधान की मूल भावना का हिस्सा है। जब इस अधिकार को प्रशासनिक पाबंदियों के जरिए जकड़ दिया जाता है, तो समाज की असंतोष भरी आवाजें भूमिगत होने लगती हैं। दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और यातायात को सुचारू रखने के लिए ये नियम जरूरी हैं। हालांकि, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक असहमतियों का गला घोंटना खतरनाक परंपरा है। जंतर-मंतर पर बैरिकेडिंग बढ़ा दी गई है और प्रदर्शनकारियों को बिना किसी ठोस कारण के हिरासत में ले लिया जाता है।
प्रशासनिक फैसलों और सॉफ्टवेयर पाबंदियों पर उठ रहे गंभीर सवाल
राजधानी के इन हालिया हालातों के अलावा देश के अन्य राज्यों से भी नागरिकों के अधिकारों और प्रशासनिक बाधाओं की खबरें सामने आ रही हैं। अरुणाचल प्रदेश में ईसाई समुदाय के लोगों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम का कहना है कि स्टेट बैंक के सॉफ्टवेयर में कुछ तकनीकी अड़चनें या बदलाव ऐसे हैं जो ईसाई आवेदकों को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का विकल्प चुनने से रोक रहे हैं। इस तकनीकी समस्या के कारण सैकड़ों युवाओं को सरकारी योजनाओं और दस्तावेजों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। समुदाय के प्रतिनिधियों ने इसे जानबूझकर की गई उपेक्षा बताया है, हालांकि बैंक अधिकारियों ने तकनीकी गड़बड़ी को जल्द ठीक करने का भरोसा दिया है।
इसी तरह कर्नाटक के दावणगेरे जिले से भी प्रशासनिक दबाव का एक बड़ा मामला उजागर हुआ है। वहां के उपायुक्त यानी डीसी ने बयान दिया है कि जिला प्रशासन पर मतदाता सूची या अन्य सरकारी रिकॉर्ड्स से करीब तीन हजार नाम हटाने का भारी दबाव बनाया जा रहा था। इस तरह के खुलासे यह दिखाते हैं कि किस प्रकार जमीनी स्तर पर प्रशासनिक मशीनरी पर राजनीतिक या बाहरी दबाव काम कर रहे हैं। जब स्थानीय स्तर के अधिकारी खुलकर इस तरह के दबावों की बात सामने रखते हैं, तो व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े होते हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शनों से लेकर दूरदराज के जिलों तक, आम आदमी के अधिकार हर स्तर पर कसौटी पर कसे जा रहे हैं।
लोकतांत्रिक अधिकारों का दायरा और जनता का बढ़ता संघर्ष
देश के अलग-अलग कोनों से आ रही इन तमाम खबरों की कड़ियों को आपस में जोड़ा जाए तो एक चिंताजनक तस्वीर उभरती है। एक तरफ जंतर-मंतर पर विरोध की आवाज को कागजी औपचारिकताओं में उलझाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ डिजिटल सॉफ्टवेयर और स्थानीय प्रशासन के जरिए लोगों के बुनियादी विकल्प सीमित किए जा रहे हैं। जब नागरिक अपनी बात कहने के लिए सड़क पर उतरते हैं, तो उन्हें धारा 144 और पुलिस थानों का सामना करना पड़ता है। आम जनता के पास अब सवाल पूछने के अलावा बहुत कम रास्ते बचे हैं। मीडिया और स्वतंत्र रिपोर्ट्स इन मुद्दों को लगातार उजागर कर रही हैं ताकि सरकारें जवाबदेह बन सकें।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है कि लोकतंत्र की असली ताकत उसकी सहनशीलता में होती है। जब असहमति को अपराध मान लिया जाता है और विरोध के हर केंद्र को बंद करने की कोशिश होती है, तो समाज में बेचैनी बढ़ती है। जंतर-मंतर पर पाबंदियों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज इस बात की याद दिलाती है कि संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता दी है, वह किसी भी सूरत में छीनी नहीं जानी चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या प्रशासन इन पाबंदियों पर पुनर्विचार करता है या विरोध की इस दीवार को और मजबूत किया जाता है।









