अहमदाबाद/ग्राउंड ब्यूरो — गुजरात की राजनीति में जब भी कोई बड़ा बदलाव होता है, तो सबसे पहले पुराने और अनुभवी चेहरों की चर्चा शुरू हो जाती है। पिछले कुछ घंटों से सोशल मीडिया और इंटरनेट पर अचानक शंकारसिंह वाघ का नाम तेजी से सर्च किया जाने लगा है। गूगल ट्रेंड्स पर उनके नाम में आए इस अचानक उछाल ने राजनीतिक पंडितों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या बापू यानी शंकारसिंह वाघ फिर से राज्य की सक्रिय राजनीति में कोई बड़ा दांव खेलने जा रहे हैं या इसके पीछे कोई और वजह है।
हमारी टीम ने इस मामले की तह तक जाने के लिए गांधीनगर और अहमदाबाद के कई राजनीतिक जानकारों से बात की। शुरुआती पड़ताल में यह सामने आया कि उनके कुछ पुराने बयानों और हालिया बैठकों के बाद समर्थकों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। गुजरात की राजनीति में वाघ का कद हमेशा से बड़ा रहा है। उन्होंने अपने लंबे करियर में कई दलों के साथ काम किया है और हर बार राज्य के चुनावी समीकरणों पर गहरा असर छोड़ा है। यही वजह है कि उनके नाम मात्र से ही राजनीतिक सरगर्मी बढ़ जाती है।
गुजरात की सियासत में बापू की वापसी की अटकलें क्यों तेज हुईं?
स्थानीय जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे स्थानीय निकाय और आगामी राजनीतिक स्थितियां बदल रही हैं, वैसे-वैसे पुराने नेताओं की भूमिका पर फिर से विचार किया जा रहा है। शंकारसिंह वाघ के करीबियों का कहना है कि वे लगातार राज्य के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी राय रखते आए हैं। हाल के दिनों में उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों में बढ़ती सक्रियता ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। हालांकि, अभी तक किसी भी दल की तरफ से आधिकारिक रूप से कोई बड़ी घोषणा नहीं की गई है, लेकिन हवा में तैरती खबरें बहुत कुछ इशारा कर रही हैं।
आम जनता और उनके पुराने समर्थकों के बीच भी यह चर्चा का विषय बन गया है कि क्या गुजरात में कोई नया मोर्चा या समीकरण बन सकता है। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि बापू का अगला कदम क्या होगा। वाघ की शैली हमेशा से आक्रामक और जनता से सीधे जुड़ने वाली रही है। यही कारण है कि इंटरनेट पर लोग उनके पुराने इतिहास और मौजूदा बयानों को खंगाल रहे हैं ताकि यह अंदाजा लगाया जा सके कि आने वाले दिनों में क्या होने वाला है।
विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और अंदरखाने की हलचल
इस पूरे घटनाक्रम पर जब हमने सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों के नेताओं से बातचीत की, तो सभी ने सधी हुई प्रतिक्रिया दी। कोई भी खुलकर यह मानने को तैयार नहीं है कि इस अचानक उठी हलचल का चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन अंदरखाने सभी दल इस बात से वाकिफ हैं कि शंकारसिंह वाघ का प्रभाव आज भी कई सीटों पर सीधा असर डाल सकता है। विरोधी दल भले ही इसे ज्यादा तवज्जो न दे रहे हों, लेकिन उनकी नजरें भी हर एक गतिविधि पर टिकी हुई हैं।
जमीनी स्तर पर हमारे संवाददाताओं ने पाया कि युवा मतदाताओं में भी इस बात को लेकर उत्सुकता है कि आखिर गुजरात के पुराने क्षत्रप किस प्रकार अपनी सियासत को आगे बढ़ा रहे हैं। लोग सोशल मीडिया पर उनके पुराने भाषणों और वीडियो को शेयर कर रहे हैं। इससे यह साफ पता चलता है कि भले ही वे पिछले कुछ समय से प्रत्यक्ष चुनावी दौड़ से दूर रहे हों, लेकिन उनका नाम आज भी जनता की यादों और बहसों में पूरी तरह जिंदा है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और आगे का रुख
द फ्रीलान्स की इस विशेष पड़ताल से यह स्पष्ट होता है कि शंकारसिंह वाघ को लेकर इंटरनेट पर जो ट्रेंड देखा जा रहा है, वह किसी सुनियोजित अभियान का हिस्सा नहीं बल्कि लोगों की स्वाभाविक जिज्ञासा का परिणाम है। गुजरात के राजनीतिक आकाश में जब भी बादलों की तरह ऐसी चर्चाएं तैरती हैं, तो कोई न कोई नया घटनाक्रम जरूर जन्म लेता है। हमारी टीम इस पूरे मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही कोई पुख्ता जानकारी सामने आएगी, पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाई जाएगी। तब तक हर कोई यही कयास लगा रहा है कि बापू का अगला सियासी पत्ता क्या होगा।


