नई दिल्ली और ग्रामीण भारत से हमारे विशेष संवाद — देश भर में इन दिनों सांप के काटने यानी 'पामुकाटु' की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। हर साल मानसून और उसके बाद के महीनों में खेतों और गांवों में सांप निकलने की खबरें आम हो जाती हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल हजारों लोग सांप के काटने का शिकार होते हैं। इनमें से कई लोगों की जान समय पर सही इलाज न मिलने के कारण चली जाती है। द फ्रीलान्स की टीम ने इस गंभीर समस्या पर जमीनी स्तर पर पड़ताल की है।
हमारी ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर घटनाएं रात के समय या खेतों में काम करते वक्त होती हैं। लोग अंधेरे में बिना टॉर्च के चलते हैं या बिना जूतों के खेतों में उतरते हैं। कई बार लोग तुरंत अस्पताल जाने के बजाय स्थानीय ओझा या झाड़-फूंक करने वालों के चक्कर में पड़ जाते हैं। इस वजह से कीमती समय बर्बाद हो जाता है और जहर पूरे शरीर में फैल जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सांप काटने पर सबसे पहला काम मरीज को तुरंत नजदीकी सरकारी अस्पताल ले जाना है जहाँ एंटी-वेनम इंजेक्शन उपलब्ध हो।
ग्रामीण इलाकों में क्यों बढ़ रहा है खतरा
गांवों और खेतों के आसपास लगातार इंसानी बस्तियां बस रही हैं। जंगलों और झाड़ियों को काटकर मकान बनाए जा रहे हैं। जब प्राकृतिक आवास उजड़ जाते हैं, तो सांप भोजन और सुरक्षित जगह की तलाश में इंसानी बस्तियों की तरफ आने लगते हैं। इसके अलावा, खेतों में पानी भरने के कारण भी सांप अपने बिलों से बाहर निकलकर सुरक्षित स्थानों पर शरण लेते हैं। यही मुख्य वजह है कि किसानों और मवेशी चराने वालों को सबसे ज्यादा खतरा होता है।
स्थानीय अस्पतालों की स्थिति भी कई जगह चिंताजनक पाई गई है। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर तो होते हैं लेकिन सांप के जहर को बेअसर करने वाली दवा यानी एंटी-वेनम की कमी अक्सर बनी रहती है। मरीजों को जिला अस्पताल या बड़े शहरों के अस्पतालों के लिए रेफर करना पड़ता है। रास्ते में लगने वाले समय के कारण कई बार मरीज की हालत बहुत नाजुक हो जाती है। स्वास्थ्य प्रशासन को इस दिशा में तुरंत और ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है ताकि हर छोटे अस्पताल में दवा मिल सके।
झाड़-फूंक के चक्कर में गंवा देते हैं जान
हमारे देश के ग्रामीण समाज में आज भी अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरी हैं। सांप काटने के बाद लोग डॉक्टर के पास जाने से पहले तांत्रिकों या वैद्यों के पास दौड़ते हैं। वे लोग जड़ी-बूटियां खिलाते हैं या मंत्रों से जहर उतारने का दावा करते हैं। यह लापरवाही सीधे तौर पर मौत को बुलावा देना है। वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि जहरीले सांप के डसने पर केवल एंटी-वेनम ही जीवन बचा सकता है। किसी भी अन्य घरेलू नुस्खे या झाड़-फूंक से जहर का असर कम नहीं होता है।
जागरूकता अभियानों की कमी भी इस समस्या को और गंभीर बना रही है। स्कूलों और पंचायतों में इस बात की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए कि सांप काटने पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं। मरीज को घबराना नहीं चाहिए क्योंकि डर की वजह से दिल की धड़कन तेज हो जाती है और खून के जरिए जहर तेजी से फैलता है। पीड़ित को शांत रखना और उसके हाथ या पैर को स्थिर रखना बहुत जरूरी होता है ताकि जहर दिल तक न पहुंचे।
बचाव के लिए कौन से जरूरी कदम उठाने होंगे
सांपों के खतरे से निपटने के लिए सरकार और आम जनता दोनों को मिलकर काम करना होगा। खेतों में काम करते समय हमेशा रबर के लंबे जूते और पूरी बांह के कपड़े पहनने चाहिए। रात के समय बाहर निकलते वक्त हमेशा टॉर्च का इस्तेमाल करें। घरों के आसपास साफ-सफाई रखें और कचरा या पुरानी लकड़ी के ढेर जमा न होने दें। यदि घर के अंदर या आसपास सांप दिखाई दे, तो तुरंत किसी पेशेवर स्नेक रेस्क्यू टीम को फोन करें, उसे खुद पकड़ने की कोशिश बिल्कुल न करें।
द फ्रीलान्स की इस पड़ताल का निष्कर्ष साफ है कि अगर हम समय रहते सतर्क हो जाएं और अंधविश्वास को छोड़कर तुरंत सही इलाज लें, तो सैकड़ों जानें बचाई जा सकती हैं। मीडिया, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर गांव-गांव तक सही जानकारी पहुंचानी होगी। तभी इस मौसमी और गंभीर खतरे से पूरी तरह निपटा जा सकता है।







