नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश भर में मौसम का मिजाज एक बार फिर चिंता का विषय बन गया है। इस समय एशिया और भारत के कई हिस्सों पर 'सुपर अल नीनो' का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। हमारे फील्ड रिसर्च के मुताबिक, वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि इस बार का अल नीनो अपने सबसे खतरनाक रूप में सामने आ रहा है। तापमान में हुई भारी बढ़ोतरी ने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। भारत में भी इसका सीधा असर आने वाले महीनों के मौसम और खासकर खेती किसानी पर पड़ने की पूरी आशंका है।
ताजा अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, अल नीनो का तापमान इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा 3.047 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है। मौसम विशेषज्ञों का साफ कहना है कि तापमान में इतनी बड़ी बढ़त का मतलब है कि इस बार गर्मी और सूखे के हालात बहुत भयानक हो सकते हैं। हाल ही में विज्ञान जगत से जुड़ी चेतावनियों में यह भी सामने आया है कि इस 'सुपर-डुपर अल नीनो' की वजह से दुनियाभर में बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य संबंधी संकट और मौतें तक हो सकती हैं। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इससे करीब साढ़े चार लाख लोगों की जान पर बड़ा खतरा आ सकता है।
एशियाई देशों पर दोहरे दबाव की मार
हमारी जमीनी पड़ताल और एशियाई देशों से मिल रही खबरों से साफ है कि पूरा महाद्वीप इस समय दोहरे दबाव का सामना कर रहा है। एक तरफ जहां भारी गर्मी और पानी की कमी का संकट है, वहीं दूसरी तरफ मौसम का अचानक बदलना आम जनजीवन को तबाह कर रहा है। भारत के पड़ोसी देशों समेत पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में नदियां सूखने लगी हैं और जमीन का जलस्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। भारत सरकार के मंत्री जितेंद्र सिंह के बयान के मुताबिक, यह खतरनाक अल नीनो चक्र फरवरी 2027 तक लंबा खिंच सकता है। यानी आने वाले कई साल तक मौसम का यह चक्र आम आदमी की मुश्किलें बढ़ाने वाला है।
बिहार और उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से मिल रही शुरुआती रिपोर्टें भी डराने वाली हैं। आमतौर पर कड़ाके की ठंड के लिए जाने जाने वाले इलाकों में इस बार मौसम का अलग ही मिजाज देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि साल 1950 के बाद यह सबसे विनाशकारी सुपर अल नीनो है। इसका असर सिर्फ सर्दियों पर ही नहीं, बल्कि आने वाले मानसून पर भी पड़ेगा। हालांकि सरकार और मौसम विभाग का कहना है कि मानसून पर इसका कितना असर होगा, यह कई दूसरे स्थानीय और वैश्विक कारकों पर भी निर्भर करेगा। फिर भी एहतियात के तौर पर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।
खेती और किसानों की बढ़ी मुश्किलें
इस पूरी स्थिति का सबसे बुरा असर देश के अन्नदाता यानी किसानों पर पड़ रहा है। जब मौसम इस तरह अनिश्चित हो जाता है, तो फसलों की बुआई और कटाई का पूरा गणित बिगड़ जाता है। हमारे रिपोर्टर ने जब ग्रामीण इलाकों का दौरा किया, तो किसानों के चेहरों पर साफ चिंता दिखाई दी। किसानों का कहना है कि अगर समय पर बारिश नहीं हुई और तापमान यूं ही बढ़ता रहा, तो उनकी सालभर की मेहनत बर्बाद हो जाएगी। धान और गेहूं जैसी मुख्य फसलों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
आम जनता के स्तर पर भी इस भीषण बदलाव को लेकर अब लोग सतर्क होने लगे हैं। शहरों में पानी की बचत और बिजली की बढ़ती मांग को लेकर लोग अभी से चिंता जता रहे हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को इस संभावित आपदा से निपटने के लिए अभी से एक ठोस योजना तैयार करनी होगी। पानी के वैकल्पिक स्रोतों को खोजना और सूखा प्रभावित इलाकों के लिए विशेष पैकेज लाना बेहद जरूरी हो गया है। द फ्रीलान्स की टीम इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और जमीनी सच आप तक पहुंचाती रहेगी।
भविष्य की रणनीति और एहतियाती कदम
वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन से जुड़े लोगों का साफ कहना है कि अब समय हाथ से निकल रहा है। जलवायु परिवर्तन के इन भयानक रूपों से निपटने के लिए केवल कागजी योजनाएं काफी नहीं हैं। जमीन पर उतरकर काम करना होगा। सरकार और आम जनता दोनों को पानी का संचय करने और बिजली बचाने की आदत डालनी होगी। आने वाले दिनों में यह सुपर अल नीनो हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सतर्क रहना और समय रहते बचाव के उपाय करना ही एकमात्र रास्ता बचा है।








