कीव और वाशिंगटन से आ रही ताजा अंतरराष्ट्रीय खबरों के मुताबिक यूक्रेन की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को जल्द से जल्द खत्म कराने की बात जोर-शोर से उठाई है। इसी कूटनीतिक दबाव के बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की के तेवर बदलते हुए नजर आ रहे हैं। पिछले काफी समय से युद्ध के हालात के कारण देश में चुनाव टाल रहे जेलेंस्की ने अब साठ दिनों के भीतर चुनाव कराने की संभावना पर अपनी सहमति जताई है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने पश्चिमी देशों और अमेरिका के सामने एक शर्त भी रख दी है ताकि यूक्रेन के हितों की अनदेखी न हो सके।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जेलेंस्की ने अमेरिकी प्रशासन के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि अगर उन्हें युद्ध के मैदान में सुरक्षा और रूसी हमलों से राहत की पुख्ता गारंटी मिलती है तो वह राजनीतिक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने से पीछे नहीं हटेंगे। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप और उनके सहयोगियों की ओर से लगातार यह दबाव बनाया जा रहा है कि यूक्रेन में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को फिर से बहाल किया जाए। इस बीच ग्रीनलैंड को लेकर भी अमेरिकी दावों और बयानों ने वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। ट्रंप का दावा है कि ग्रीनलैंड के पास तेल और गैस के बड़े भंडार मिल सकते हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ेगा। ऐसे में यूक्रेन और रूस के बीच शांति समझौते की शर्तों को लेकर कीव में बेचैनी साफ देखी जा सकती है।
रूस की रिफाइनरियों पर हमले रोकने को लेकर क्या है जेलेंस्की की शर्त?
युद्ध के इस नाजुक मोड़ पर यूक्रेनी राष्ट्रपति ने एक बड़ा कूटनीतिक दांव चलते हुए कहा है कि वे रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा ठिकानों पर अपने ड्रोन हमलों को रोकने के लिए तैयार हैं। लेकिन इसके बदले में उन्होंने मांग की है कि रूस को भी बदले में यूक्रेन के बुनियादी ढांचे, बिजली घरों और नागरिक बस्तियों पर बमबारी बंद करनी होगी। जेलेंस्की का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस के कई इलाकों में यूक्रेनी हमलों से ईंधन की आपूर्ति प्रभावित हुई थी। मॉस्को ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और पश्चिमी देशों को चेतावनी दी थी। अब देखना यह है कि ट्रंप प्रशासन इस आंशिक संघर्ष विराम के प्रस्ताव पर किस तरह से अपनी प्रतिक्रिया देता है और क्या दोनों पक्ष इस पर राजी होते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तरफ से भी तीखा और व्यंग्यात्मक काउंटर ऑफर सामने आया है। रूसी मीडिया और विश्लेषकों का मानना है कि मॉस्को पश्चिमी देशों के बनाए गए किसी भी दबाव वाले साठ दिवसीय सीजफायर फॉर्मूले को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। पुतिन प्रशासन लगातार यह संकेत दे रहा है कि यूक्रेन को जमीन पर अपनी मौजूदा कमजोर स्थिति को स्वीकार करना ही होगा। इस सियासी बयानबाजी के बीच यूक्रेनी जनता और वहां के सैनिक असमंजस में हैं कि क्या वाकई यह युद्ध कूटनीति के जरिए थमने वाला है या फिर यह केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का एक और नया दाاपेच बनकर रह जाएगा।
साठ दिन के सीजफायर और चुनाव की सुगबुगाहट का ज़मीनी असर
यूक्रेन के भीतर हालात यह हैं कि लगातार ढाई साल से ज्यादा समय से चल रहे इस युद्ध के कारण देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा चुकी है। लाखों लोग अपने घर छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर हैं और देश की ऊर्जा व्यवस्था सर्दियों के इस मौसम में सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। ऐसे में यदि वास्तव में साठ दिनों के भीतर चुनाव कराने की कोई प्रक्रिया शुरू होती है तो इसके लिए युद्ध के मैदान में कम से कम आंशिक शांति का होना अनिवार्य है। जेलेंस्की अच्छी तरह जानते हैं कि बिना किसी ठोस पश्चिमी सुरक्षा गारंटी के चुनाव कराना देश में और अधिक राजनीतिक अस्थिरता को न्योता दे सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के राष्ट्रपति पद संभालने से पहले ही वैश्विक कूटनीति में मोहरे तेजी से बदले जा रहे हैं। अमेरिका की ओर से यूक्रेन पर शांति वार्ता की टेबल पर आने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे जेलेंस्की के पास अब ज्यादा विकल्प नहीं बचे हैं। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो पाएगा कि क्या रूस और यूक्रेन सचमुच किसी समझौते की ओर बढ़ रहे हैं या फिर यह केवल कूटनीतिक दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति भर है। द फ्रीलान्स इस अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर लगातार पैनी नजर बनाए रखेगा और आपको इससे जुड़ी हर बारीक जानकारी ग्राउंड रिपोर्ट के जरिए उपलब्ध कराता रहेगा।









