मोक्ष की नगरी काशी में पितृ पक्ष के दौरान एक अनूठी तस्वीर देखने को मिली, जहां देश ही नहीं बल्कि सात समंदर पार बैठे विदेशों से भी श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के लिए तकनीक का सहारा लेते नजर आए। इस बार मॉरीशस, इटली, इंग्लैंड, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड समेत कई देशों में रहने वाले सनातन धर्मावलंबियों ने जूम मीटिंग के जरिए काशी से जुड़कर अपने पितरों का तर्पण और पिंडदान कराया। इस विशेष आयोजन में मॉरीशस के मंत्री, फ्रांस एवं स्विट्जरलैंड के राजदूत समेत कई गणमान्य लोगों ने ऑनलाइन माध्यम से अपने पितरों का श्राद्ध किया।
तकनीक और परंपरा का अनूठा संगम
विश्व हिंदू संत परिषद के इंटरनेशनल अध्यक्ष, मॉरीशस के निरंजनी अखाड़ा सदस्य और मां कामाख्या पीठ के महामंडलेश्वर अरुणानंद गिरी ने काशी के घाट पर पूरी विधि-विधान के साथ यह श्राद्ध कर्म संपन्न कराया। महामंडलेश्वर ने बताया कि मॉरीशस में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश, बिहार और दक्षिण भारत के मूल निवासी रहते हैं जो पीढ़ियों पहले वहां बस गए थे। विदेशों में रहने वाली नई पीढ़ी को सनातन परंपराओं और पितृ कर्म के महत्व से जोड़ने के लिए पिछले छह महीनों से इसकी तैयारी की जा रही थी।
इस ऑनलाइन अनुष्ठान में त्रिपिंडी श्राद्ध कर्म के तहत मॉरीशस से करीब 250, इटली के मिलान से लगभग 50 और इंग्लैंड से करीब 20 श्रद्धालुओं समेत कुल 850 से अधिक लोगों ने वर्चुअली हिस्सा लिया। दूरी चाहे जितनी भी हो, आधुनिक तकनीक ने आस्था और परंपरा के बीच की दीवार को गिरा दिया है।
जूम पर संकल्प और काशी में पिंडदान
ऑनलाइन पितृ कर्म की पूरी प्रक्रिया बेहद अनुशासित तरीके से पूरी की गई। श्रद्धालु अपने-अपने देशों और घरों से जूम मीटिंग के जरिए काशी से जुड़े। काशी में संकल्प की प्रक्रिया शुरू होने पर श्रद्धालुओं ने खुद अपना नाम, गोत्र और अपने पितरों के नाम का स्मरण किया। इसके बाद, काशी के घाटों पर मौजूद उनके प्रतिनिधियों और पुरोहितों ने शास्त्रीय विधि से पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया को पूरा किया।
स्वामी अरुणानंद गिरी ने बताया कि विदेशों में रह रहे सभी लोगों के पूर्वजों के नाम व्यक्तिगत रूप से पुरोहितों के लिए याद रखना संभव नहीं होता, इसलिए यह व्यवस्था की गई कि श्रद्धालु खुद अपने पूर्वजों का नाम लेकर संकल्प लें। इसके बाद मां गंगा के पवित्र जल में तर्पण कराया जाता है।
काशी में पितृ पक्ष पर विदेशियों का पिंडदान, जूम के जरिए जुड़े लोग। pic.twitter.com/example
— The Freelance (@TheFreelanceIN) September 2024
तीर्थों का महत्व और तर्पण की विधि
सनातन संस्कृति में हरिद्वार, प्रयागराज, काशी और गया जैसे प्रमुख तीर्थों का पितृ कर्म में विशेष स्थान माना गया है। महामंडलेश्वर ने बताया कि जो लोग विदेशों में होने के कारण इन तीर्थों पर नहीं आ सकते, उनके लिए प्रतिनिधियों के माध्यम से यह पवित्र कार्य कराया जा रहा है। तर्पण के दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुख कर तांबे या पीतल के पात्र में गंगाजल, कच्चा दूध, काले तिल, अक्षत, जौ और सफेद पुष्प मिलाकर जलांजलि दी जाती है।
अनुष्ठान पूरा होने के बाद स्वामी अरुणानंद गिरी ने सभी श्रद्धालुओं को जूम के माध्यम से संबोधित किया और उनके पितरों की मोक्ष प्राप्ति की कामना की। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि भौगोलिक दूरियां चाहें जितनी भी हों, भारतीय संस्कृति और आस्था की जड़ें दुनिया भर में बेहद मजबूत हैं।
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