नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के मेडिकल छात्रों के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन यानी एनएमसी ने एक बहुत बड़ा और राहत भरा फैसला लिया है। जो छात्र लंबे समय से एमबीबीएस के पहले साल की परीक्षा में अटक गए थे, उनके लिए अब आगे के रास्ते खुल गए हैं। एनएमसी के नए नियमों के तहत अब छात्रों को फर्स्ट प्रोफेशनल परीक्षा पास करने के लिए एक और अतिरिक्त मौका यानी मर्सी अटेम्प्ट दिया जाएगा। इस फैसले से हजारों उन छात्र-छात्राओं को सीधा फायदा मिलेगा जो परीक्षा पास न कर पाने की वजह से मानसिक तनाव में थे और अपना करियर बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
मेडिकल की पढ़ाई को देश में सबसे कठिन माना जाता है और इसमें प्रवेश पाना जितना मुश्किल है, उतनी ही कड़ी इसकी परीक्षाएं होती हैं। अभी तक के पुराने नियमों के अनुसार छात्रों को एमबीबीएस का पहला साल पास करने के लिए सीमित प्रयास ही मिलते थे। तय समय में परीक्षा पास न कर पाने वाले छात्रों को सीधा बाहर का रास्ता देखना पड़ता था। लेकिन अब अदालत के फैसलों और छात्रों की लगातार उठ रही मांगों को ध्यान में रखते हुए एनएमसी ने अपने नियमों में बदलाव किया है। इस नए बदलाव के बाद छात्रों को अपनी योग्यता साबित करने का एक और निष्पक्ष अवसर मिल सकेगा।
10 साल की समय सीमा से कमजोर और तनावग्रस्त छात्रों को राहत
केवल पहला साल पास करने का मौका ही नहीं, बल्कि एनएमसी ने पूरे एमबीबीएस पाठ्यक्रम को पूरा करने की समय सीमा को भी बड़ा कर दिया है। अब कोई भी छात्र अपने मेडिकल एडमिशन की तारीख से लेकर पूरे 10 साल के भीतर अपनी डिग्री पूरी कर सकेगा। पहले यह समय सीमा बहुत कम थी, जिसकी वजह से कई छात्र तय साल में कोर्स पूरा न होने पर डॉक्टर बनने का अपना सपना बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते थे। मेडिकल शिक्षा के जानकारों का मानना है कि यह कदम छात्रों पर से अत्यधिक मानसिक दबाव को कम करेगा और उन्हें बिना किसी घबराहट के अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने का मौका देगा।
विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और छात्र संगठनों ने एनएमसी के इस कदम का स्वागत किया है। उनका कहना है कि डॉक्टर बनना एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है, जिसमें कई बार व्यक्तिगत या स्वास्थ्य कारणों से छात्र पीछे छूट जाते हैं। ऐसे में सरकार और नियामक संस्था का यह संवेदनशील रवैया देश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने में भी मदद करेगा। अदालत ने भी एनएमसी के इन अनुशासनात्मक लेकिन छात्र-हितैषी नियमों को सही ठहराया है, जिससे यह साफ हो गया है कि नियम कड़े जरूर होने चाहिए लेकिन छात्रों के भविष्य को पूरी तरह बर्बाद करने वाले नहीं होने चाहिए।
छात्रों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश और आगे की प्रक्रिया
एनएमसी के इन नए दिशा-निर्देशों के आने के बाद अब देश के सभी मेडिकल विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को अपनी आंतरिक परीक्षाओं की व्यवस्था में बदलाव करना होगा। जो छात्र पहले नियमों के फेर में फंसकर बाहर हो चुके थे, वे अब अपने संबंधित संस्थानों से संपर्क कर सकते हैं। उन्हें इस मर्सी अटेम्प्ट और बढ़े हुए समय का पूरा लाभ उठाने के लिए आवेदन करना होगा। कॉलेज प्रशासन भी अब इन मामलों को अधिक मानवीय दृष्टिकोण से देखेगा और छात्रों को आगे बढ़ने के लिए जरूरी कागजी कार्रवाई पूरी कराएगा।
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल में यह बात सामने आई है कि देश के कई राज्यों में मेडिकल छात्र इस खबर के बाद से काफी राहत महसूस कर रहे हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत कई बड़े मेडिकल हबों में छात्रों ने इस फैसले को अपने जीवन की दूसरी पारी की तरह देखा है। हालांकि जानकारों का यह भी कहना है कि छात्रों को इस मौके को हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि मेडिकल जैसे पवित्र पेशे में मरीजों की जान से जुड़ा मामला होता है, इसलिए पढ़ाई की गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता है।
भविष्य की चिकित्सा शिक्षा और एनएमसी की नई नीतियां
आने वाले समय में एनएमसी देश की मेडिकल शिक्षा को और अधिक पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए कई और बदलाव कर सकती है। लगातार बढ़ रहे मानसिक तनाव और छात्रों द्वारा उठाए जाने वाले चरम कदमों को रोकने के लिए यह बहुत जरूरी था कि नियमों में थोड़ा लचीलापन लाया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि कड़े नियम अनुशासन के लिए जरूरी हैं, लेकिन छात्रों को सुधार का मौका देना एक अच्छे सिस्टम की निशानी है। इस पूरी प्रक्रिया पर देश भर के मेडिकल छात्रों और शिक्षकों की पैनी नजर बनी हुई है ताकि हर जरूरतमंद छात्र तक इस नई सुविधा का पूरा लाभ पहुंच सके।






