नई दिल्ली — दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों और उनके मालिकों की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जाने-माने फिल्मकार आरोन सॉरकिन अपनी नई बहुप्रतीक्षित फिल्म 'द सोशल रेकनिंग' के साथ पर्दे पर लौटने को तैयार हैं। यह फिल्म आने वाली 9 अक्टूबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। फिल्म की कहानी फेसबुक की एक बड़ी व्हिसलब्लोअर और अंदरूनी खुलासों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। इस फिल्म को लेकर टेक जगत और फिल्मी गलियारों में चर्चाएं बहुत तेज हो गई हैं।
फिल्म के आने से पहले ही इसके टीज़र और समीक्षाओं ने सोशल मीडिया दिग्गजों की नींद उड़ा दी है। द गार्जियन और बीबीसी जैसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह फिल्म साल 2010 में आई मशहूर फिल्म 'द सोशल नेटवर्क' का ही एक तरह से अगला और तीखा रूप है। हालांकि, इस बार कहानी में मुख्य जोर फेसबुक के अंदरूनी घोटालों, यूजर डेटा के व्यापार और समाज पर पड़ने वाले बुरे असर पर दिया गया है। फिल्म में मार्क जुकरबर्ग के किरदार को एक ऐसे ताकतवर इंसान के रूप में दिखाया गया है जो तकनीक के जरिए दुनिया की नब्ज पर काबू पाना चाहता है।
मार्क जुकरबर्ग के नए और कड़े रूप की होगी परख
इस नई फिल्म में मार्क जुकरबर्ग की भूमिका को लेकर दर्शकों और समीक्षकों में खासी उत्सुकता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की शुरुआती समीक्षाओं में यह बात सामने आई है कि फिल्म मार्क जुकरबर्ग के फैसलों को सीधे कटघरे में खड़ा करती है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि कैसे मुनाफे की होड़ में टेक कंपनियों ने आम लोगों की निजता को ताक पर रख दिया। इसमें उन सभी अंदरूनी दस्तावेजों का जिक्र किया गया है जिन्हें एक पूर्व व्हिसलब्लोअर ने दुनिया के सामने लाकर हंगामा मचा दिया था।
फिल्म के निर्देशक आरोन सॉरकिन अपनी तेज-तर्रार और तीखी पटकथा के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने इस बार भी अपने उसी पुराने अंदाज का इस्तेमाल किया है जहां हर संवाद किसी कानूनी मुकदमे की जिरह जैसा लगता है। हालांकि, कुछ अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों का यह भी मानना है कि फिल्म केवल पुरानी बातों को दोहराती है और इसमें कोई बहुत नया चौंकाने वाला खुलासा नहीं है। इसके बावजूद, आम दर्शकों और तकनीक के जानकारों के बीच इस फिल्म को लेकर जबरदस्त कौतूहल बना हुआ है कि इसमें पर्दे के पीछे के कौन से नए राज खुलेंगे।
सिनेमाघरों में होगी फेसबुक के कामकाज की असली सुनवाई
फिल्म की रिलीज की तारीख नजदीक आते ही टेक इंडस्ट्री में सुगबुगाहट तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि यह फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर कोई बड़ा बदलाव न ला पाए, लेकिन यह दुनिया भर के नीति निर्माताओं का ध्यान एक बार फिर सोशल मीडिया के नियमों की ओर खींचेगी। आज के दौर में जब हर शख्स के हाथ में स्मार्टफोन है और फेक न्यूज से लेकर डेटा चोरी आम बात हो गई है, ऐसे समय में यह फिल्म समाज को आईना दिखाने का काम करेगी।
भारतीय दर्शकों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच भी इस बात की चर्चा है कि क्या यह फिल्म भारत जैसे बड़े डिजिटल बाजार में टेक कंपनियों पर लगाम लगाने में कोई मदद कर पाएगी। फिल्म के ट्रेलर और गानों ने पहले ही सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। अब देखना यह होगा कि 9 अक्टूबर को जब यह फिल्म पर्दे पर आएगी, तब मार्क जुकरबर्ग की कंपनी और आम दर्शक इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
तकनीक और सत्ता के गठजोड़ पर कड़ा प्रहार
आरोन सॉरकिन की यह फिल्म केवल एक कंपनी की कहानी नहीं है, बल्कि यह आज के दौर की उस तकनीक संस्कृति पर सवाल उठाती है जो हमारी राजनीति और विचारों को तय कर रही है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एल्गोरिदम के जरिए लोगों के गुस्से और नफरत का इस्तेमाल करके कंपनियां अपना मुनाफा बढ़ाती हैं। यह मुद्दा आज के समय में भारत समेत पूरी दुनिया में बहस के केंद्र में है।
कुल मिलाकर, 'द सोशल रेकनिंग' महज एक मनोरंजन की फिल्म नहीं है, बल्कि यह आधुनिक तकनीक की दुनिया का एक ऐसा दस्तावेज है जो हमसे कई कठिन सवाल पूछता है। क्या आम आदमी अब अपनी डिजिटल आजादी के प्रति जागरूक हो रहा है या फिर वह इन बड़ी कंपनियों के जाल में फंस चुका है? फिल्म के रिलीज होने के बाद इन सवालों पर और खुलकर चर्चा होने की पूरी उम्मीद है।





