नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — आज गूगल ट्रेंड्स पर अचानक एक ऐसा नाम छाया रहा जिसे देखकर कई लोग हैरान रह गए। मलयालम भाषा में 'व ' यानी धोखेबाज सांप नाम से बच्चों का एक गाना और लोक कथा इंटरनेट पर खूब सर्च की जा रही है। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस ट्रेंड की गहराई से पड़ताल की, तो सामने आया कि माता-पिता इन दिनों बच्चों को मोबाइल या कंप्यूटर पर क्षेत्रीय भाषा की कहानियां और कविताएं दिखाने में खासी दिलचस्पी ले रहे हैं। बच्चों के मनोरंजन और उनकी भाषा सीखने के सफर में यह डिजिटल दौर एक नया मोड़ ले रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस लोकप्रिय बच्चों के गाने में सांप और अन्य पात्रों के जरिए एक नैतिक सीख देने की कोशिश की गई है। मलयालम भाषी परिवारों के अलावा दूसरे राज्यों में रहने वाले लोग भी अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए ऐसे वीडियो तलाश रहे हैं। आज की डिजिटल दुनिया में बच्चों के लिए बनी यह नर्सरी राइम और परियों की कहानियां यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर बच्चों के बीच काफी देखी जा रही हैं। माता-पिता का मानना है कि ऐसे वीडियो से बच्चों का मनोरंजन होने के साथ-साथ उन्हें अपनी स्थानीय भाषा और संस्कृति की बुनियादी बातें भी आसानी से समझ आ जाती हैं।
बच्चों के डिजिटल मनोरंजन में क्षेत्रीय भाषाओं की वापसी
आज से कुछ साल पहले तक बच्चों के गानों और कार्टून की दुनिया में अंग्रेजी या हिंदी का दबदबा हुआ करता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों में गूगल सर्च के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। मलयालम, तमिल, तेलुगु और बंगाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के बच्चों के गीत इंटरनेट पर बड़ी तेजी से जगह बना रहे हैं। 'रॉकी स्नेक' या 'व ' जैसे शीर्षक इस बात का सबूत हैं कि मेकर्स अब पारंपरिक लोक कथाओं को नए एनिमेटेड रूप में ढालकर पेश कर रहे हैं। इससे बच्चों का ध्यान भी इन कहानियों पर आसानी से टिक जाता है और वे पारंपरिक संस्कृति से भी जुड़े रहते हैं।
मनोरंजन विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की पसंद अब बहुत तेजी से बदल रही है। केवल पश्चिमी देशों के कार्टून देखने के बजाय अब माता-पिता भी ऐसी सामग्री पसंद कर रहे हैं जिसमें स्थानीय संस्कृति, नैतिक शिक्षा और पारंपरिक मूल्य शामिल हों। इस ट्रेंड ने यह भी साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय सामग्री के लिए आज के समय में एक बहुत बड़ा और भूखा दर्शक वर्ग डिजिटल दुनिया में मौजूद है, जो हर दिन कुछ नया और अपनी भाषा में देखना चाहता है।
माता-पिता की बढ़ती चिंताएं और सुरक्षित डिजिटल सामग्री की तलाश
आज के दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चों को स्क्रीन पर क्या दिखाया जाए और क्या नहीं। इंटरनेट पर अलाना-फलाना कई तरह की सामग्रियां मौजूद हैं जो बच्चों के लिए कई बार सही नहीं होती हैं। ऐसे में 'व ' जैसे पारंपरिक और नैतिक शिक्षा वाले गाने माता-पिता के लिए एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभर रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि लोग अब अपने बच्चों के लिए ऐसे क्रिएटर्स को ढूंढ रहे हैं जो बिना किसी हिंसा या गलत संदेश के, एक साफ-सुथरा मनोरंजन पेश कर सकें। लोक कथाओं के जरिए बच्चों को सही और गलत का फर्क समझाना हमेशा से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है।
जमीनी स्तर पर बात करें तो केरल और आसपास के इलाकों में बाल साहित्य से जुड़े लोग इस बात से खुश हैं कि डिजिटल युग में भी पुरानी कहानियां नए रूप में जिंदा हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि बच्चों को केवल स्क्रीन के सहारे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि डिजिटल कहानियों के साथ-साथ उन्हें वास्तविक किताबें भी पढ़ानी चाहिए। फिर भी, इंटरनेट पर इस तरह के क्षेत्रीय ट्रेंड्स यह साफ दिखाते हैं कि स्थानीय भाषाएं आज भी लोगों के दिलों में गहराई से बसी हुई हैं और उनका आकर्षण कभी कम नहीं होने वाला है।
डिजिटल बाजार और बाल साहित्य का बदलता हुआ भविष्य
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि गूगल ट्रेंड्स केवल राजनीति या बड़ी घटनाओं तक सीमित नहीं हैं। इंटरनेट की दुनिया में आम लोगों की छोटी-छोटी और सांस्कृतिक जरूरतें भी अब बड़े ट्रेंड्स के रूप में सामने आ रही हैं। 'व ' का यह वायरल होना इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय भाषा की कला और साहित्य में अभी भी अपार संभावनाएं छिपी हैं। आने वाले दिनों में इस तरह की और भी कई स्थानीय कहानियां डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रही हैं।






