देशभर के मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए एक बार फिर से बुरी खबर सामने आ रही है। यदि आप भी अपने स्मार्टफोन पर हर महीने होने वाले खर्च से परेशान हैं, तो आने वाले कुछ महीनों में आपकी जेब और अधिक ढीली होने के लिए तैयार हो जाइए। बाजार विश्लेषकों और वित्तीय शोध संस्थानों की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, देश की प्रमुख टेलीकॉम कंपनियां—रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया (Vi)—आने वाले चार से पांच महीनों के भीतर अपने मोबाइल रिचार्ज प्लान्स की कीमतों में 12 से 15 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी करने की तैयारी कर रही हैं। इस कदम से आम आदमी के मासिक बजट पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि इंटरनेट डेटा और वॉयस कॉलिंग सेवाएं एक बार फिर महंगी हो जाएंगी।
दूरसंचार बाजार में बदलता समीकरण और कंपनियों की रणनीति
भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान काफी उथल-पुथल देखने को मिली है। कई छोटी और मझौली कंपनियों के बाजार से बाहर होने या बड़ी कंपनियों में विलय हो जाने के बाद अब यह पूरा उद्योग मुख्य रूप से '3+1' यानी तीन निजी और एक सरकारी (BSNL) खिलाड़ी के हाथों में सिमट गया है। प्रतिस्पर्धा का दायरा सीमित होने और बाजार पर कुछ ही कंपनियों का एकाधिकार स्थापित होने के कारण अब कंपनियों के लिए अपने ग्राहकों से अधिक शुल्क वसूलना आसान हो गया है।
सेंट्रम इंस्टीट्यूशनल रिसर्च की एक हालिया रिपोर्ट में इस बात का खुलकर जिक्र किया गया है कि दूरसंचार कंपनियों के पास अब मूल्य निर्धारण (प्राइसिंग पावर) का पूरा नियंत्रण आ चुका है। पिछले कुछ सालों में कंपनियों ने 5G नेटवर्क के विस्तार और तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए भारी-भरकम पूंजी निवेश किया है। अब कंपनियां इस निवेश पर अपना मुनाफा वसूलने और अपने वित्तीय स्वास्थ्य को सुधारने के लिए टैरिफ दरों में बढ़ोतरी करने का एक भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती हैं।
संबंधित खबरें
औसत राजस्व प्रति ग्राहक (ARPU) में लगातार हो रहा इजाफा
telecom industry के वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई से सितंबर) के दौरान देश की तीनों प्रमुख निजी दूरसंचार कंपनियों के औसत राजस्व प्रति ग्राहक यानी ARPU में 0.8 प्रतिशत से लेकर 2.0 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की जा सकती है। इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग अब पुराने और सुस्त पड़ चुके 2G नेटवर्क को पूरी तरह अलविदा कह रहा है।
उपभोक्ता तेजी से हाई-स्पीड 4G और अत्याधुनिक 5G सेवाओं की तरफ रुख कर रहे हैं, जो तुलनात्मक रूप से महंगे होते हैं। इसके अलावा, प्रीपेड कनेक्शन की तुलना में पोस्टपेड कनेक्शन लेने वाले ग्राहकों की संख्या में भी इजाफा देखा जा रहा है। यही वजह है कि कंपनियां प्रति ग्राहक अधिक राजस्व कमाने में सफल हो रही हैं, और आने वाले दिनों में इस आंकड़े को और ऊपर ले जाने के लिए टैरिफ हाइक का रास्ता अपनाया जाएगा।
"दूरसंचार क्षेत्र में कंपनियों की संख्या घटने और 5G नेटवर्क पर हुए भारी निवेश के बाद, कंपनियों के लिए अपने मुनाफे को बनाए रखने और वित्तीय संतुलन हासिल करने के लिए टैरिफ बढ़ाना एक अनिवार्य व्यावसायिक कदम बन गया है। आगामी महीनों में उपभोक्ताओं को महंगे रिचार्ज प्लांस का सामना करना पड़ सकता है।" — वित्तीय विश्लेषक, सेंट्रम इंस्टीट्यूशनल रिसर्च
बाजार हिस्सेदारी और 5G नेटवर्क का बढ़ता दायरा
एक तरफ जहां रिचार्ज प्लान महंगे होने की तलवार उपभोक्ताओं पर लटक रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रमुख टेलीकॉम ऑपरेटर अपने ग्राहक आधार को लगातार मजबूत करने में जुटे हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, समीक्षाधीन तिमाही के दौरान रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया की बाजार हिस्सेदारी में सकारात्मक वृद्धि जारी रही है। इस दौरान देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस जियो ने लाखों नए ग्राहकों को अपने साथ जोड़ा है, जिससे उसका कुल यूजर बेस और अधिक विशाल हो गया है।
वहीं, भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया भी अपने नेटवर्क के आधुनिकीकरण में पीछे नहीं हैं। रिलायंस जियो और भारती एयरटेल ने देश के 95 प्रतिशत से अधिक जिलों में अपनी 5G सेवाओं का सफल कवरेज पूरा कर लिया है। इसके विपरीत, वोडाफोन आइडिया भी देश के लगभग 200 प्रमुख शहरों में अपनी 5जी सेवाओं को उतार चुकी है और तेजी से अपने नेटवर्क का विस्तार कर रही है। इन हाई-टेक सेवाओं को मेंटेन करने का खर्च अंततः उपभोक्ताओं की जेब से ही वसूला जा रहा है।
आम जनता के बजट पर पड़ेगा सीधा असर
महंगाई के इस दौर में मोबाइल रिचार्ज का महंगा होना मध्यम वर्ग और आम नागरिकों के लिए किसी झटके से कम नहीं है। आज के डिजिटल युग में स्मार्टफोन और इंटरनेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि पढ़ाई, बैंकिंग, ऑफिस के काम और आजीविका का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। ऐसे में बार-बार मोबाइल रिचार्ज के दाम बढ़ना सीधे तौर पर हर घर के मासिक बजट को प्रभावित करता है। देखना यह होगा कि क्या इस संभावित मूल्य वृद्धि के विरोध में उपभोक्ता किसी अन्य विकल्प की तलाश करते हैं या फिर उन्हें बढ़ी हुई कीमतें मजबूरी में चुकानी ही पड़ती हैं।







