कोच्चि/ग्राउंड ब्यूरो — इंटरनेट और गूगल सर्च पर इन दिनों मलयालम भाषा का एक शब्द 'पा' यानी सांप अचानक से सबसे ऊपर ट्रेंड करने लगा है। इस ट्रेंड के पीछे कोई राजनीतिक उथल-पुथल या वन्यजीव विभाग की कोई बड़ी चेतावनी नहीं है। असल वजह बच्चों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा एक नया कार्टून गाना और नैतिक शिक्षा देने वाली कहानी है। द टाइम्स ऑफ इंडिया समेत कई मीडिया मंचों पर इस विषय को लेकर बच्चों के मनोरंजन और उनकी शिक्षा से जुड़े पहलुओं पर बड़ी चर्चा छिड़ गई है। आम लोग और अभिभावक इस दिलचस्प विषय के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाने में लगे हुए हैं।
इस पूरे ट्रेंड की शुरुआत 'रोकी स्नेक - वंचक पा' नाम के एक खास नर्सरी गीत और मूक-अभिनय या एनिमेटेड कहानी से हुई है। इस गाने को विशेष रूप से छोटे बच्चों और नर्सरी के छात्रों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गाने की कहानी में एक ऐसे सांप का जिक्र है जिसे वंचक यानी थोड़ा चालाक या धोखेबाज रूप में दिखाया गया है। लेकिन कहानी का अंत बच्चों को एक बहुत ही सुंदर और जरूरी सबक सिखाता है। यही वजह है कि दक्षिण भारत के राज्यों में, खासकर केरल और आसपास के इलाकों में लोग इस गाने को इंटरनेट पर सबसे ज्यादा खोज रहे हैं।
बच्चों के लिए क्यों खास है रोकी स्नेक की यह कहानी?
आजकल के दौर में बच्चों का स्क्रीन टाइम और उनकी डिजिटल लर्निंग माता-पिता के लिए एक बड़ा विषय बन गया है। ऐसे में माता-पिता हमेशा ऐसी सामग्री की तलाश में रहते हैं जो बच्चों का मनोरंजन करने के साथ-साथ उन्हें नैतिक मूल्य भी सिखा सके। 'वंचक पा' यानी धोखेबाज सांप की यह कहानी बच्चों को मीठी बातों और धोखे से दूर रहने की सीख देती है। पारंपरिक लोक कथाओं और आधुनिक एनिमेशन का यह मेल बच्चों को अपनी तरफ बहुत तेजी से खींच रहा है। यही कारण है कि बच्चे इस गाने को बार-बार देखना और सुनना पसंद कर रहे हैं।
डिजिटल मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय भाषाओं में इस तरह की बाल सामग्री का लोकप्रिय होना एक सकारात्मक संकेत है। अंग्रेजी गानों की भीड़ के बीच अपनी मातृभाषा में ऐसी कहानियों से बच्चों का जुड़ाव मजबूत होता है। स्कूल के शिक्षक और छोटे बच्चों के प्ले-स्कूल भी इस तरह के गानों का इस्तेमाल अपनी कक्षाओं में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए कर रहे हैं। इससे न केवल बच्चों की भाषा पर पकड़ मजबूत होती है बल्कि वे मनोरंजन के जरिए जल्दी नई चीजें भी सीखते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ रही है क्षेत्रीय बाल सामग्री की मांग
पिछले कुछ महीनों में यह देखा गया है कि क्षेत्रीय भाषाओं यानी मलयालम, तमिल, तेलुगु और हिंदी में बच्चों के लिए बनने वाली कहानियों के व्यूज बहुत तेजी से बढ़े हैं। यूट्यूब और अन्य वीडियो स्ट्रीमिंग ऐप पर अभिभावक अपने बच्चों के लिए सुरक्षित और ज्ञानवर्धक वीडियो खोजते हैं। 'रोकी स्नेक' जैसी कहानियां इसी डिजिटल जरूरत को पूरा करती हैं। मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि आने वाले दिनों में इस तरह की और भी कई एनिमेटेड कहानियों को बाजार में उतारा जा सकता है ताकि बच्चों को बेहतर विकल्प मिल सकें।
ग्रामीण और शहरी इलाकों में स्मार्टफोन की पहुंच आसान होने के बाद इस तरह के रुझान बहुत जल्दी वायरल हो जाते हैं। एक साधारण सा नर्सरी गीत कैसे देखते ही देखते पूरे देश के ट्रेंडिंग चार्ट में अपनी जगह बना लेता है, यह इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल में यह बात सामने आई है कि इस तरह के ट्रेंड्स पूरी तरह से आम जनता के वास्तविक क्लिक और सर्च पर आधारित होते हैं। अभिभावकों और शिक्षकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया से यह साफ है कि बच्चों के लिए ऐसी रचनात्मक सामग्री की मांग भविष्य में और ज्यादा बढ़ने वाली है।
अभिभावकों के लिए डिजिटल शिक्षा और मनोरंजन का नया माध्यम
इस पूरे मामले ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि इंटरनेट की दुनिया में बच्चों का कंटेंट सबसे तेजी से दर्शकों को आकर्षित करता है। 'पा' यानी सांप के इस मलयालम ट्रेंड ने यह दिखा दिया कि भाषा की दीवारें अब डिजिटल युग में छोटी होती जा रही हैं। केरल से शुरू हुआ यह बाल गीत अब देश के दूसरे हिस्सों के उन लोगों का भी ध्यान खींच रहा है जो दक्षिण भारतीय संस्कृति और बाल साहित्य में रुचि रखते हैं। द फ्रीलान्स इस बात पर लगातार नजर बनाए रखेगा कि क्षेत्रीय डिजिटल सामग्री आने वाले समय में मुख्यधारा के मनोरंजन को कैसे प्रभावित करती है।




