नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की मंडियों और खरीद केंद्रों पर इन दिनों किसानों की बेचैनी साफ देखी जा सकती है। धान की बंपर पैदावार के बाद अब गोदामों में जगह कम पड़ने लगी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले सीजन का अनाज अभी भी गोदामों में भरा हुआ है। ऐसे में नए धान को सुरक्षित रखने के लिए कोई ठोस जगह नहीं बच रही है। किसान अपनी फसल को बोरियों में भरकर खुले आसमान के नीचे रखने को मजबूर हैं।
देश के कई राज्यों में बारिश का खतरा मंडरा रहा है जिससे किसानों की नींद उड़ गई है। खुले में पड़े धान के बोरों को बचाने के लिए तिरपाल का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन यह नाकाफी साबित हो रहा है। तेज हवा और बारिश के कारण अनाज के भीगने का डर लगातार बना हुआ है। यदि समय रहते अनाज को सुरक्षित गोदामों में नहीं पहुंचाया गया, तो किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
गोदामों में क्यों पड़ी है जगह की कमी?
भंडारण निगम के सूत्रों के अनुसार पिछले कई सालों से लगातार अच्छा अनाज उत्पादन हो रहा है। पुराना स्टॉक अभी तक पूरी तरह बिक नहीं पाया है और मिलों में भी धान की पिसाई की रफ्तार धीमी चल रही है। इसके चलते भारतीय खाद्य निगम और अन्य सरकारी एजेंसियों के पास नए धान को रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं बची है। मिल मालिक और प्रशासन के बीच तालमेल की कमी भी इस समस्या को और ज्यादा बढ़ा रही है।
सरकारी स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि अनाज को सुरक्षित स्थानों पर भेजने के लिए मालगाड़ियों की संख्या बढ़ाई जा रही है। इसके अलावा साइलो यानी आधुनिक धातु के बड़े बर्तनों में भंडारण बढ़ाने का काम भी तेजी से चल रहा है। हालांकि जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का असर दिखने में अभी काफी समय लग सकता है।
किसानों की आय और मेहनत पर सीधा असर
अनाज के रख-रखाव में हो रही इस देरी का सीधा असर किसानों की जेब पर पड़ रहा है। नमी बढ़ जाने के कारण व्यापारी धान की कम कीमत लगा रहे हैं। कई मंडियों में किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। सालभर की मेहनत के बाद ऐसा हाल देखकर किसानों में भारी गुस्सा और निराशा का माहौल है। वे सरकार से तुरंत खरीद और उठान तेज करने की मांग कर रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर किसान संगठनों ने प्रशासन के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि हर साल धान कटाई के समय यही पुरानी समस्या सामने आती है, लेकिन सरकार इससे कोई सबक नहीं लेती है। यदि समय रहते बड़े स्तर पर वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं की गई, तो देश का अन्नदाता कर्ज के दलदल में और ज्यादा फंसता चला जाएगा।
आगे की राह और आपातकालीन कदम
इस पूरे संकट से पार पाने के लिए अब युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। रेलवे और खाद्य मंत्रालय को मिलकर एक विशेष कार्ययोजना बनानी होगी ताकि पुराने अनाज को तुरंत दूसरे राज्यों में भेजा जा सके। द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि जब तक प्रशासनिक सुस्ती खत्म नहीं होगी, तब तक किसानों की इस परेशानी का कोई स्थायी हल नहीं निकल पाएगा। आने वाले कुछ हफ्तों में मौसम का रुख तय करेगा कि देश के अन्न भंडार की यह स्थिति कितना और गंभीर रूप लेती है।











