भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा रेपो रेट में बढ़ोतरी किए जाने के बाद से होम लोन लेने वाले करोड़ों ग्राहकों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या उन्हें अपनी लोन की मासिक किस्त (EMI) बढ़ानी चाहिए या फिर लोन चुकाने की अवधि (Tenure) को लंबा करना चाहिए? रेपो रेट में बदलाव के बाद बैंक आमतौर पर ग्राहकों के सामने यही दो मुख्य विकल्प रखते हैं, और सही फैसला न ले पाने की स्थिति में ग्राहकों को जेब ढीली करनी पड़ सकती है।
ज्यादा ईएमआई देना या टेन्योर बढ़ाना: क्या है बेहतर?
जब फ्लोटिंग-रेट होम लोन महंगा हो जाता है, तो कर्ज लेने वालों के पास मुख्य रूप से दो ही रास्ते बचते हैं। पहला यह कि वे बढ़ी हुई ईएमआई देना स्वीकार कर लें और मूल अवधि को बनाए रखें। दूसरा विकल्प यह होता है कि मौजूदा ईएमआई को लगभग स्थिर रखा जाए और लोन की अवधि बढ़ा दी जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन उधारकर्ताओं के पास पर्याप्त मासिक बजट और वित्तीय क्षमता है, उनके लिए उच्च ईएमआई का भुगतान करना आमतौर पर एक सस्ता विकल्प होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि लोन की अवधि बढ़ाने से बैंक को पूरी लोन अवधि के दौरान चुकाया जाने वाला कुल ब्याज बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। हालांकि, जिन परिवारों का मासिक खर्च पहले से ही सीमित है, उनके लिए अचानक ईएमआई बढ़ाना तनावपूर्ण हो सकता है, ऐसे में वे मजबूरी में टेन्योर बढ़ाने का विकल्प चुनते हैं।
गणित को समझिए: उदाहरण से जानें असर
इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी ने 25 सालों के लिए 7.5% की ब्याज दर पर 40 लाख रुपये का होम लोन लिया है, तो उसकी ईएमआई लगभग 29,559 रुपये बनती है। यदि ब्याज दरें 25 बीपीएस बढ़कर 7.75% हो जाती हैं, तो ईएमआई बढ़कर लगभग 30,213 रुपये यानी हर महीने करीब 654 रुपये बढ़ जाती है।
यदि यह उच्च ब्याज दर पूरे 25 वर्षों तक बनी रहती है, तो कुल ब्याज भुगतान लगभग 48.68 लाख रुपये से बढ़कर 50.64 लाख रुपये हो जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि आपको सिर्फ ब्याज के रूप में लगभग 1.96 लाख रुपये अतिरिक्त चुकाने होंगे। यदि आप इसके बजाय लोन का टेन्योर बढ़ा देते हैं, तो यह लागत और भी अधिक हो सकती है।
विशेषज्ञों की सलाह और प्री-पेमेंट का विकल्प
बैंकबाजार के सीईओ अधिल शेट्टी का कहना है कि होम लोन की लागत इस बात पर निर्भर करती है कि बैंक बदलाव को कैसे लागू करते हैं। कई संस्थान ईएमआई को स्थिर रखने के लिए सीधे तौर पर लोन की अवधि बढ़ा देते हैं, जो दिखने में आसान लगता है लेकिन समय के साथ काफी महंगा साबित होता है।
इससे बचने का एक बेहतरीन तरीका समय-समय पर प्री-पेमेंट (अग्रिम भुगतान) करना है। कर्जदारों को अपने बैंक से संपर्क करके यह स्पष्ट करना चाहिए कि ब्याज दरों में बदलाव का उनकी किस्त पर क्या असर पड़ रहा है। हर साल थोड़ा-थोड़ा अतिरिक्त भुगतान करने से लंबी अवधि में ब्याज के भारी बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
वित्तीय बाजारों और लोन दरों से जुड़े इस विश्लेषण का उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी देना है। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले अपने बैंक या वित्तीय सलाहकार से व्यक्तिगत परामर्श अवश्य लें। 'The Freelance' किसी भी प्रकार के आर्थिक नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं है।
बिजनेस एवं मार्केट डेस्क, द फ्रीलांस
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