न्यूनतम वेतन (Minimum Wage) और उससे जुड़े श्रम अधिकारों का मुद्दा एक बार फिर देश भर में गरमाया हुआ है। 'द फ्रीलान्स' की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में हम देश के विभिन्न राज्यों में श्रमिकों की मजदूरी, महंगाई भत्ते (VDA) में संशोधन और अदालती फैसलों की जमीनी हकीकत का विश्लेषण कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में आए अलग-अलग राज्यों के फैसलों ने यह साबित कर दिया है कि देश के संगठित और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए तय होने वाली न्यूनतम मजदूरी में भारी असमानता है। एक तरफ जहां कुछ राज्यों में कर्मचारियों को कानूनी लड़ाइयों के बाद बड़ी राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर देश के एक बड़े हिस्से के मजदूर पुरानी और बेहद कम दिहाड़ी पर काम करने को मजबूर हैं।
हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला और कर्मचारियों की जीत
इस सप्ताह श्रम जगत की सबसे बड़ी कानूनी खबरों में हरियाणा से एक अहम अपडेट सामने आया। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने से बचने की कोशिश की जा रही थी। अदालत के इस फैसले से राज्य के हजारों कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन का रास्ता साफ हो गया है। जानकारों का मानना है कि यह फैसला लंबे समय से चल रहे प्रशासनिक गतिरोध को तोड़ने वाला साबित होगा। हालांकि, जमीन पर इसके पूर्ण क्रियान्वयन को लेकर अभी भी श्रमिक संगठनों की निगाहें टिकी हुई हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसका लाभ हर पात्र कर्मचारी तक पहुंचे।
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केंद्र सरकार की ओर से दिवाली पर बढ़ी हुई दरें
त्योहारी सीजन के मद्देनजर केंद्र सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए वेरिएबल डीयरनेस अलाउंस (VDA) में संशोधन का ऐलान किया था। इस संशोधन के बाद कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने वाले अकुशल और कुशल मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी बढ़कर 1,111 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच गई है, जबकि माइनिंग सेक्टर में यह आंकड़ा 1,095 रुपये प्रतिदिन दर्ज किया गया। सरकार के इस कदम को हालांकि एक बड़े वर्ग के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन असंगठित क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में यह बढ़ोतरी भी जीवनयापन के वास्तविक खर्चों को पूरा करने के लिए नाकाफी साबित हो रही है।
बिहार के सवा तीन करोड़ मजदूरों की दुर्दशा
इसके ठीक विपरीत, देश के सबसे बड़े श्रम आपूर्तिकर्ता राज्यों में शुमार बिहार की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिहार के लगभग सवा तीन करोड़ मजदूर पुरानी दिहाड़ी पर ही काम करने को मजबूर हैं। राज्य में समय पर न्यूनतम वेतन दरों का पुनरीक्षण न होने और महंगाई के अनुपात में मजदूरी न बढ़ने के कारण श्रमिकों की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। रोजगार की तलाश में बड़े पैमाने पर होने वाले पलायन के पीछे भी यही एक बड़ा कारण है, जहां स्थानीय स्तर पर तय न्यूनतम मजदूरी से परिवार का गुजर-बसर करना असंभव हो जाता है।
मध्य प्रदेश में 50 लाख श्रमिकों का महंगाई भत्ता
मध्य प्रदेश से भी श्रमिकों के लिए एक अजीबोगरीब अपडेट सामने आया है, जहां उद्योगों और सरकारी विभागों में कार्यरत लगभग 50 लाख श्रमिकों के महंगाई भत्ते में संशोधन किया गया है। लेकिन इस बढ़ोतरी की राशि मात्र 6 रुपये प्रतिदिन है। महंगाई के इस दौर में छह रुपये की दैनिक वृद्धि को लेकर श्रमिक संगठनों ने कड़ी नाराजगी जताई है। यूनियनों का तर्क है कि इस मामूली बढ़ोतरी से बढ़ती महंगाई के प्रभाव को कम करने में कोई मदद नहीं मिलती, और यह सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाती है।
आगामी परिदृश्य और श्रम सुधारों की चुनौतियां
भारत में न्यूनतम वेतन की यह तस्वीर स्पष्ट करती है कि राज्यों के अपने अलग नियम और श्रम विभागों की सुस्ती के कारण असमानता गहरी होती जा रही है। देश भर के मजदूर संगठन लंबे समय से एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (National Floor Wage) के कड़े प्रावधानों और उसके प्रभावी क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं। जब तक केंद्र और राज्य सरकारें असंगठित क्षेत्र के हर श्रमिक तक सामाजिक सुरक्षा और कानूनी रूप से तय न्यूनतम मजदूरी की गारंटी नहीं पहुंचातीं, तब तक इस तरह की खंडित और असमान बढ़ोतरी से मजदूरों की थाली की खालीपन को दूर नहीं किया जा सकता।







