देश के तकनीकी शिक्षा के सर्वोच्च मंदिर कहे जाने वाले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) की दीवारों के पीछे एक ऐसा सच पल रहा है, जो बौद्धिक उत्कृष्टता की चमक के नीचे गहरे अंधकार को छिपाए हुए है। हाल ही में बीबीसी और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए सामने आए आरक्षित वर्ग के छात्रों के अनुभव इस बात की तस्दीक करते हैं कि मेरिट और आधुनिकता के इस दौर में भी जातिगत पूर्वाग्रह परिसरों की नसों में किस कदर घुले हुए हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन में हमने यह जानने की कोशिश की है कि आखिर क्यों देश के ये सबसे मेधावी युवा अपनी ही छांव में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
परिसरों की दबी जुबान: भेदभाव का अदृश्य जाल
जब एक छात्र कठिन परिश्रम के बाद देश के शीर्ष तकनीकी संस्थान में प्रवेश पाता है, तो उसका सपना एक उज्ज्वल भविष्य का होता है। लेकिन कई आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए यह सफर एक मानसिक युद्ध में बदल जाता है। कक्षाओं से लेकर हॉस्टल के कमरों तक, उन्हें हर कदम पर उस कथित 'मेरिट' के ताने सुनने पड़ते हैं जो उनकी काबिलियत को सिर्फ उनकी जाति से जोड़कर देखता है। छात्रों ने खुलकर साझा किया है कि कैसे अकादमिक प्रदर्शन में थोड़ी भी उतार-चढ़ाव होने पर उन्हें ही कमजोर मान लिया जाता है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ ऐसा नहीं होता।
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संस्थागत उदासीनता और प्रोफेसरों की भूमिका
भेदभाव का यह दायरा सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बार अकादमिक स्टाफ और प्रोफेसरों की कार्यशैली में भी झलकता है। 'द वायर' की हालिया रिपोर्ट में आईआईटी बॉम्बे के एक छात्र की आत्महत्या के मामले में प्रोफेसर दुला द्वारा कथित रूप से लगातार नीचा दिखाने, कड़ी सजा देने और बेइज्जत करने के इतिहास का खुलासा किया गया है। ऐसी घटनाएं साबित करती हैं कि जब शिक्षक ही पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाएं, तो छात्रों के लिए न्याय की उम्मीद करना और भी कठिन हो जाता है। छात्रों का यह भी आरोप है कि संस्थान स्तर पर बनी एंटी-डिस्क्रिमिनेशन कमेटियां अक्सर कागजी साबित होती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य का संकट: आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े
इन हालात का सबसे भयानक परिणाम छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एक कार्यबल (टास्क फोर्स) के हालिया सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सर्वे के अनुसार, लगभग नौ प्रतिशत छात्रों ने यह स्वीकार किया है कि उनके मन में आत्महत्या तक के विचार आए हैं। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली की विफलता का चीखता हुआ प्रमाण है। लगातार बढ़ता तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव इन युवाओं को मौत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर रहा है।
खामोशी तोड़ने का वक्त: बदलाव की अनवरत मांग
अब समय आ गया है कि आईआईटी जैसे संस्थान अपनी इस 'संस्थागत दृष्टिहीनता' से बाहर निकलें। केवल तकनीकी नवाचार या ग्लोबल रैंकिंग की दौड़ में शामिल होना काफी नहीं है, जब तक कि परिसरों के भीतर सामाजिक न्याय और समानता का माहौल सुनिश्चित न किया जाए। 'द लेंस' और अन्य मीडिया माध्यमों से सामने आ रही ये कहानियां इस बात की चेतावनी हैं कि यदि समय रहते इन गहरी जड़ों वाले पूर्वाग्रहों को समाप्त नहीं किया गया, तो यह देश की युवा मेधा का सबसे बड़ा नुकसान होगा।
- आईआईटी परिसरों में आरक्षित वर्ग के छात्रों को जातिगत भेदभाव और ताने सुनने पड़ते हैं।
- उच्चतम न्यायालय के कार्यबल सर्वे में 9% छात्रों ने आत्महत्या के विचार आने की बात स्वीकार की है।
- आईआईटी बॉम्बे आत्महत्या मामले में प्रोफेसरों द्वारा मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप सामने आए हैं।
- संस्थानों की आंतरिक शिकायत समितियां और एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल अक्सर निष्क्रिय नजर आती हैं।
यह रिपोर्ट इस बात की मांग करती है कि भारत के हर उच्च शिक्षण संस्थान में न केवल सख्त नीतियां बनाई जाएं, बल्कि उनका कड़ाई से पालन भी हो ताकि कोई भी छात्र अपनी सामाजिक पहचान के कारण खुद को अकेला और असहाय न महसूस करे।









