पंजाब की प्रतिष्ठित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) परिसर में बीते कुछ दिनों से सुलग रहा असंतोष अब एक बड़े और विस्फोटक विवाद का रूप लेता जा रहा है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब इस पूरे घटनाक्रम की ज़मीनी हकीकत टटोलने की कोशिश की, तो परत-दर-परत ऐसे खुलासे सामने आए जो प्रशासनिक कार्यप्रणाली और छात्रों की सुरक्षा पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करते हैं। इस मामले में अब एक नया और सनसनीखेज मोड़ आ चुका है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है।
सफाई देने वाली छात्राएं हुईं बागी, लगाए गंभीर आरोप
कुछ दिन पहले जो छात्राएं यूनिवर्सिटी प्रशासन के पक्ष में कैमरे के सामने सफाई देती नज़र आ रही थीं, वे अब अपने बयानों से पूरी तरह पलट चुकी हैं। इन छात्राओं ने दबी जुबान से नहीं, बल्कि खुलकर यह स्वीकार किया है कि उनसे जो वीडियो बाइट्स या बयान दिलवाए गए थे, वे उनकी अपनी मर्जी से नहीं थे। पीड़ित छात्राओं और उनके सहयोगियों का आरोप है कि यूनिवर्सिटी के उच्च अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और दबाव बनाकर एक तयशुदा स्क्रिप्ट पर कैमरे के आगे बोलने के लिए मजबूर किया।
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प्रशासन की भूमिका और डराने-धमकाने के हथकंडे
हमारी फील्ड इन्वेस्टिगेटर टीम ने जब कैंपस के भीतर और बाहर कुछ प्रत्यक्षदर्शियों और छात्रों से बातचीत की, तो एक डरावनी तस्वीर उभरकर सामने आई। छात्रों का कहना है कि जब भी कैंपस में किसी संवेदनशील मुद्दे पर आवाज उठाई जाती है, तो प्रशासन निष्पक्ष जांच करने के बजाय डराने-धमकाने का रास्ता चुनता है। बयानों को बदलने का यह पूरा खेल कथित तौर पर विश्वविद्यालय की छवि बचाने के लिए खेला गया था, लेकिन अब यह प्रशासनिक दांव उल्टा पड़ता हुआ साफ दिखाई दे रहा है।
पीड़ित परिवार की न्याय की गुहार और राजनीतिक सरगर्मी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पीड़ित परिवार का संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। हाल ही में न्याय की आस में पीड़ित परिवार ने स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ क्षेत्र के प्रभारी मंत्री से भी मुलाकात की है। परिवार ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंपते हुए मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो और जबरन बयान दिलवाने वाले दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए। स्थानीय स्तर पर जसविंदर सिंह और प्रकाश सिंह भट्टी जैसे सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है।
प्रशासनिक सुस्ती और स्वास्थ्य-सुरक्षा अलर्ट का साया
एक तरफ जहां कैंपस के भीतर छात्रों का गुस्सा फूट रहा है, वहीं दूसरी तरफ बाहरी प्रशासनिक मशीनरी अन्य प्राथमिकताओं में उलझी हुई प्रतीत होती है। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस समय बाढ़ चौकियों और आपदा प्रबंधन की तैयारियों (जिले में 16 बाढ़ चौकियों पर टीमें तैनात) में व्यस्त है। इस प्रशासनिक व्यस्तता का फायदा उठाकर यूनिवर्सिटी प्रबंधन कथित तौर पर मामले को दबाने और लीपापोती करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। हालांकि, मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों की लगातार नजर के कारण यह मामला अब आसानी से दबने वाला नहीं है।
भविष्य का असर और हमारी पड़ताल का निष्कर्ष
'द फ्रीलान्स' की इस गहरी पड़ताल से यह साफ हो जाता है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों और उनकी सुरक्षा के नाम पर किस तरह के प्रशासनिक खेल खेले जा रहे हैं। छात्राओं का अपने बयानों से पलटना और यूनिवर्सिटी पर दबाव का आरोप लगाना महज एक कैंपस विवाद नहीं, बल्कि संस्थागत पारदर्शिता पर एक बड़ा आघात है। यदि समय रहते स्वतंत्र जांच एजेंसी ने इस मामले की सच्चाई को बाहर नहीं निकाला, तो यह आंदोलन देश के अन्य विश्वविद्यालयों तक भी फैल सकता है। हम इस मामले की पल-पल की अपडेट अपने पाठकों तक पहुंचाते रहेंगे।










