भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले पशुपालक इन दिनों एक अजीब द्वंद्व के दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मैदानी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। 'द फ्रीलान्स' की टीम ने जब देश के अलग-अलग राज्यों में जाकर पशुपालकों की सुगबुगाहट और गूगल ट्रेंड्स पर सबसे ज्यादा तलाशे जा रहे इस विषय की तह तक जाने की कोशिश की, तो कई चौंकाने वाले पहलू सामने आए।
75 हजार नई डेयरियों का ऐलान और केसीसी से राहत के मायने
पशुपालन क्षेत्र को आर्थिक मजबूती देने के लिए हाल ही में सरकार की ओर से एक बड़ा कदम उठाया गया है, जिसके तहत देशभर में 75 हजार नई डेयरियां खोले जाने की योजना पर काम चल रहा है। इसके साथ ही, सीधी जैसे जिलों में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के माध्यम से पशुपालकों को बड़ी राहत दी जा रही है। अब गाय के लिए 15 हजार रुपये, भैंस के लिए 18 हजार रुपये और चारे-दाने की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 1.60 लाख रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। सैद्धांतिक रूप से यह कदम सराहनीय है, क्योंकि इससे असंगठित क्षेत्र के पशुपालकों को साहूकारों के चंगुल से मुक्ति मिलने की उम्मीद जगी है।
संबंधित खबरें
मैदान में सुरक्षा का संकट: लगातार बढ़ती चोरियां और लाचारी
सरकारी दावों के विपरीत, जब हम जमीनी हकीकत टटोलते हैं तो तस्वीर बेहद चिंताजनक नजर आती है। सिवनी से लेकर देश के अन्य ग्रामीण इलाकों से लगातार बकरा-बकरी और मवेशी चोरी होने की घटनाएं सामने आ रही हैं। हाल ही में एक स्थानीय पशुपालक ने थाने में पहुंचकर अपनी पीड़ा व्यक्त की कि उसके घर के पास बंधे बकरा-बकरी चोरी हो गए हैं और क्षेत्र में यह कोई पहली घटना नहीं है। थानों के चक्कर काटते इन किसानों का सवाल साफ है—जब पूंजी और मवेशी ही सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो सरकार के दिए कर्ज और डेयरियों का लाभ वे कैसे उठा पाएंगे?
स्वास्थ्य और प्रशासनिक मोर्चे पर लंपी वायरस और लापरवाही
पशुधन के सामने आने वाली स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी कम गंभीर नहीं हैं। बदायूं जैसी जगहों पर लंपी वायरस से पीड़ित गोवंश को लावारिस हालत में जंगलों में छोड़ने के मामले सामने आए हैं, जिन्हें बाद में बमुश्किल पशुपालकों या स्थानीय प्रशासन के सहयोग से वापस लाया गया। बीमारी के प्रकोप से जूझ रहे इन मवेशियों की देखभाल और उनके टीकाकरण को लेकर जमीनी स्तर पर समन्वय की भारी कमी दिखाई देती है। एक तरफ पशुपालक अपनी आजीविका बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, तो दूसरी तरफ संक्रामक बीमारियों का डर उसकी रातों की नींद उड़ा रहा है।
बिहार की वह तस्वीर: प्रशासनिक लचर व्यवस्था का जीवंत उदाहरण
पशुपालकों की दुर्दशा और प्रशासनिक व्यवस्था की बानगी देखनी हो तो भागलपुर के बियाडा घाट का वह वाकया देखना काफी होगा, जहां अफसरों और एसडीआरएफ (SDRF) की मौजूदगी के बावजूद एक पशुपालक अपनी जान जोखिम में डालकर नाव पर दो भैंस लादकर गंगा पार करने को मजबूर हुआ। बीच धारा में पीछा कर उसे पकड़ा गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि नियम-कायदों और सुरक्षा व्यवस्था के बीच आम पशुपालक अपनी रोजी-रोटी के लिए किस कदर मजबूर और व्यवस्था के सामने असहाय महसूस करता है।
निष्कर्ष: कागजी योजनाओं और जमीनी हकीकत के बीच की खाई
हमारी इस खोजी पड़ताल का निष्कर्ष यह है कि जब तक जमीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था, मवेशी स्वास्थ्य सुरक्षा और प्रशासनिक संवेदनशीलता को दुरुस्त नहीं किया जाता, तब तक 75 हजार नई डेयरियां खोलने या केसीसी लोन देने के बड़े आंकड़े कागजी ही साबित होंगे। भारत के पशुपालक को आज कर्ज से ज्यादा सुरक्षा, सम्मान और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है।








