संतान की लंबी आयु, आरोग्य और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए किए जाने वाले कठोरतम व्रतों में शुमार 'जितिया' या 'जीवित्पुत्रिका व्रत' को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में तैयारियां और चर्चाएं चरम पर हैं। गूगल ट्रेंड्स पर पिछले कुछ घंटों से लगातार 'jitiya ka paran kab hai' कीवर्ड सर्च किया जा रहा है, जिससे साफ पता चलता है कि व्रत रखने वाली माताएं पारण के सटीक समय को लेकर असमंजस में हैं। 'द फ्रीलान्स' की ऑन-ग्राउंड पड़ताल और विभिन्न प्रामाणिक स्रोतों से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस साल तिथियों के फेर और उदयकाल को लेकर पंचांगीय गणनाओं में हल्की भिन्नता देखी जा रही है, जिसके कारण सही समय जानना बेहद जरूरी हो गया है।
नहाय-खाय से शुरू होता है कठिन अनुष्ठान
जितिया का यह तीन दिवसीय महापर्व सप्तमी तिथि को 'नहाय-खाय' के साथ शुरू होता है, जिसके बाद अष्टमी तिथि को महिलाएं करीब 24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला उपवास रखती हैं। इस दौरान अन्न और जल का एक भी कण ग्रहण नहीं किया जाता। मीडिया रिपोर्ट्स और स्थानीय जानकारों के अनुसार, इस बार व्रत की तिथियों को लेकर असमंजस की स्थिति यह है कि कई जगहों पर इसे 2 या 3 अक्टूबर तो कुछ जगहों पर 3 या 4 अक्टूबर के बीच मनाने की चर्चा रही है। हालांकि, मुख्य निर्जला व्रत और पारण के समय को लेकर पंचांग स्पष्ट निर्देश देते हैं कि व्रत का समापन नवमी तिथि में ही किया जाना चाहिए।
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पारण का सही समय और शुभ मुहूर्त
विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों (जैसे अमर उजाला, हिंदुस्तान, इंडिया टीवी, जनसत्ता और एनडीटीवी) की रिपोर्ट्स के मुताबिक, जितिया व्रत का पारण नवमी तिथि के सूर्योदय के बाद और निश्चित मुहूर्त में ही किया जाना चाहिए। पारण के समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है क्योंकि इस व्रत में नियमों की कठोरता का कड़ाई से पालन किया जाता है। आमतौर पर सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देने और पूजन के उपरांत ही महिलाएं अन्न-जल ग्रहण करती हैं। जानकारों का कहना है कि माताओं को अपने नजदीकी पुरोहित या स्थानीय पंचांग के अनुसार नवमी तिथि के समापन और प्रारंभ का समय अवश्य जांच लेना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की त्रुटि से बचा जा सके।
पारंपरिक विधि और जरूरी नियम
- स्नान और सूर्य अर्घ्य: पारण के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सूर्य देवता को अर्घ्य दें।
- सात्विक भोजन: व्रत खोलने के बाद सबसे पहले पारंपरिक और सात्विक आहार (जैसे मडुआ की रोटी, नोनी का साग आदि) ग्रहण करने का विधान है, जो क्षेत्र विशेष की संस्कृति पर निर्भर करता है।
- पारिवारिक सुख-शांति की प्रार्थना: संतान के दीर्घायु होने की कामना के साथ भगवान जीमूतवाहन और माता जीवित्पुत्रिका का धन्यवाद करें।
- दान-पुण्य: अपनी क्षमता के अनुसार गरीबों और जरूरतमंदों को अन्न या वस्त्र का दान अवश्य करें।
सावधानी और निष्कर्ष
चूंकि यह व्रत पूर्णतः निर्जला होता है, इसलिए पारण के समय अत्यधिक मात्रा में एक साथ भारी भोजन करने से बचना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वरिष्ठ नागरिकों की सलाह है कि शरीर को धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लाने के लिए पहले हल्के तरल पदार्थों या फलाहार से शुरुआत करें। 'द फ्रीलान्स' की यह पड़ताल पाठकों से अपील करती है कि किसी भी प्रकार की अफवाहों से दूर रहें और अपने स्थानीय पारंपरिक पंचांग के दिशा-निर्देशों का ही पालन करें ताकि आपके कठिन तप का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।








