सिनेमा की दुनिया में एक अनोखा प्रयोग है यह फिल्म
कई बार सिनेमाघरों में या ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर कुछ ऐसी फिल्में रिलीज होती हैं, जिनकी कहानी पर्दे पर खत्म होने के बाद भी हमारे जेहन में लंबे समय तक जिंदा रहती हैं। लेकिन कुछ गिनी-चुनी फिल्में ऐसी भी होती हैं, जिन्हें देखने के बाद सबसे पहला और बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर निर्देशक ने इस तरह की जटिल पटकथा के बारे में सोचा कैसे होगा? कन्नड़ सिनेमा की यह क्राइम थ्रिलर फिल्म बिल्कुल इसी श्रेणी में आती है। इसकी कहानी किसी आम कमर्शियल फिल्म की तरह सीधी-सादी लाइन में आगे नहीं बढ़ती, बल्कि यह दर्शकों को एक ऐसे भूलभुलैया में ले जाती है जहां हर मोड़ पर सच का एक नया चेहरा सामने आता है।
इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका नॉन-लीनियर नैरेटिव है, जहां एक ही घटना को अलग-अलग लोग अपनी आंखों देखी और समझ के हिसाब से बयां करते हैं। जब भी दर्शक को यह लगने लगता है कि अब मर्डर मिस्ट्री का सच पूरी तरह साफ हो चुका है, तभी अगला किरदार सामने आकर पूरी तस्वीर ही बदल देता है। यही वजह है कि इस फिल्म को देखते समय दर्शकों को अपना पूरा ध्यान स्क्रीन पर बनाए रखना पड़ता है। इसे आप कोई ऐसी हल्की-फुल्की फिल्म बिल्कुल नहीं मान सकते जिसे आधे घंटे देखने के साथ-साथ मोबाइल फोन पर चैटिंग भी की जा सके।
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साल 2014 में रक्षित शेट्टी ने बदला थ्रिलर फिल्मों का पैटर्न
यह शानदार फिल्म साल 2014 में रिलीज हुई थी, जिसे जाने-माने अभिनेता और निर्देशक रक्षित शेट्टी ने लिखा और निर्देशित किया था। निर्देशन की कमान संभालने के साथ-साथ उन्होंने इसमें 'रिची' नाम का एक बेहद खतरनाक और यादगार किरदार भी निभाया है। कहानी की शुरुआत कर्नाटक के मालपे इलाके में जन्माष्टमी के पावन पर्व के दौरान हुई एक चोरी और हत्या के सनसनीखेज मामले से होती है। इसके बाद एक पत्रकार उस इलाके में जाकर अलग-अलग लोगों से बातचीत करता है और उस खौफनाक रात की गुत्थी को सुलझाने की कोशिश में जुट जाता है।
यहीं से पांच अलग-अलग लोगों की पांच अलग कहानियां सामने आती हैं और फिल्म का असली रोमांच शुरू होता है। फिल्म देखने का सबसे मजेदार पहलू यह है कि यहां कोई एक सूत्रधार आपको पूरी बात नहीं समझाता। हर किरदार की अपनी कहानी है और हर कोई अपने नजरिए से उस घटना को सच साबित करने की कोशिश करता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है, पिछली बातों के मायने भी बदलते चले जाते हैं। यह शैली हॉलीवुड की कल्ट क्लासिक फिल्मों जैसे 'पल्प फिक्शन' या जापानी मास्टरपीस 'राशोमोन' की याद दिलाती है, जहां सच हमेशा देखने वाले की नजर पर निर्भर करता है।
रिची का अनूठा किरदार और स्थानीय संस्कृति का जादू
फिल्म में रक्षित शेट्टी द्वारा निभाया गया 'रिची' का किरदार आज भी साउथ सिनेमा के सबसे आइकॉनिक विलेन-कम-हीरो रोल्स में गिना जाता है। रेट्रो स्टाइल चश्मा, अजीबोगरीब ढंग से पहने गए कपड़े, पूरी तरह बेफिक्र अंदाज और पलभर में कुछ भी कर गुजरने वाला आक्रामक स्वभाव—रिची को देखकर कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि उसका अगला कदम क्या होगा। वह न तो बॉलीवुड की पारंपरिक फिल्मों जैसा टिपिकल विलेन है और न ही कोई आदर्शवादी हीरो। यही ग्रे शेड उसके किरदार को बेहद जीवंत और खतरनाक बनाता है।
"सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह किसी क्षेत्र की संस्कृति, उसकी भाषा और वहां के लोगों की धड़कनों को महसूस कराने का सबसे सशक्त माध्यम है। जब आप स्थानीय तत्वों को ईमानदारी से पिरोते हैं, तो कहानी खुद-ब-खुद जीवंत हो जाती है।" — फिल्म समीक्षक विश्लेषण
इसके अलावा, फिल्म में कर्नाटक की स्थानीय संस्कृति को बेहद बारीकी से दिखाया गया है। जन्माष्टमी का भव्य उत्सव, पारंपरिक 'पिली वेषा' यानी टाइगर डांस, प्रसिद्ध लोक कला यक्षगान, मछुआरों का संघर्षमय जीवन और वहां की ठेठ स्थानीय भाषा—इन सभी तत्वों को कहानी में ऐसे खूबसूरती से पिरोया गया है कि दर्शक को ऐसा महसूस होता है मानो वह किसी स्टूडियो के सेट पर नहीं, बल्कि सचमुच तटीय कर्नाटक की गलियों में घूम रहा हो।
संगीत और बैकग्राउंड स्कोर जो रूह तक उतर जाए
किसी भी थ्रिलर या मिस्ट्री फिल्म की सफलता में उसके संगीत और बैकग्राउंड स्कोर की बहुत बड़ी भूमिका होती है। 'उलिदावरु कंदंते' के मामले में यह बात सौ फीसदी सच साबित होती है। संगीतकार बी. अजनीश लोकनाथ ने पारंपरिक कन्नड़ लोक संगीत और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक साउंडस्केप का एक ऐसा अनोखा और घातक मेल तैयार किया है, जो फिल्म के रहस्य, तनाव और अजीबोगरीब माहौल को और अधिक गहरा कर देता है। स्क्रीन पर घट रही घटनाओं के साथ जब यह संगीत बजता है, तो दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
साउंड डिजाइन और सिनेमैटोग्राफी का यह मेल फिल्म को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। निर्देशक ने रात के दृश्यों और समंदर किनारे के इलाकों को जिस खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है, वह देखने लायक है। हर फ्रेम में एक डार्क टोन और एक रहस्यमयी सन्नाटा छाया रहता है जो अंत तक बांधे रखता है।
क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?
अगर आपको ऐसी फिल्में पसंद हैं जिनमें हीरो और विलेन की परिभाषा बिल्कुल साफ होती है और अंत तक सब कुछ पानी की तरह स्पष्ट हो जाता है, तो यह फिल्म आपको थोड़ी उलझी हुई और भारी लग सकती है। लेकिन अगर आप सिनेमा के शौकीन हैं और ऐसी कहानियों की तलाश में रहते हैं जहां परत-दर-परत राज खुलते हैं और एक ही घटना को अलग-अलग नजरियों से देखने का रोमांच मिलता है, तो यह फिल्म आपके लिए एक बेहतरीन तोहफा साबित होगी। आईएमडीबी पर 8.3 की ऊंची रेटिंग यूं ही नहीं मिली है, यह फिल्म डिजर्व करती है।
यह सिर्फ एक साधारण मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि पटकथा, अभिनय, निर्देशन और कर्नाटक की माटी की खुशबू को एक साथ समेटे हुए एक सिनेमैटिक अनुभव है। इसे ओटीटी पर पूरी तन्मयता के साथ देखा जाना चाहिए, खासकर उन दर्शकों के लिए जो लीक से हटकर कुछ नया देखना पसंद करते हैं।





