नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — मौसम का चक्र एक बार फिर बहुत खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। प्रशांत महासागर में एल नीनो अपनी ताकत दिखाने लगा है और इसका सीधा असर इस महीने से दिखाई देना शुरू हो जाएगा। अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों और संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि यह बदलाव केवल तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी वजह से दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा पर बहुत बड़ा संकट मंडराने लगा है और करोड़ों लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियों के अनुसार, एल नीनो के इस मजबूत रूप से लगभग चार करोड़ नब्बे लाख से अधिक लोगों के सामने गंभीर भुखमरी का संकट खड़ा हो सकता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देशों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि यहां की खेती मानसून पर टिकी होती है। जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, तो हवाओं का रुख बदल जाता है। इससे भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश या फिर अचानक बहुत ज्यादा बाढ़ जैसी स्थितियां बन जाती हैं, जिससे किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं।
किसानों की मेहनत पर फिरेगा पानी या सूखे से बिगड़ेगी बात?
जमीनी स्तर पर हमारे संवाददाताओं ने जब कृषि विशेषज्ञों से बात की तो उन्होंने बताया कि इस बार गर्मी और मानसून का असंतुलन फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। धान और खरीफ की अन्य फसलों को समय पर पानी नहीं मिला तो बाजार में अनाज की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। आम आदमी की रसोई का बजट पहले से ही महंगाई के कारण बिगड़ा हुआ है, और ऐसे में खाद्यान्न का संकट स्थिति को और अधिक बदतर बना सकता है। गांवों में किसानों ने अभी से आसमान की तरफ देखना शुरू कर दिया है क्योंकि उनके पास सिंचाई के निजी साधन सीमित हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर आपातकालीन बैठकें शुरू हो चुकी हैं। विभिन्न देशों की सरकारों को आगाह किया गया है कि वे अपने यहां अनाज के सुरक्षित भंडार को मजबूत रखें ताकि आपात स्थिति से निपटा जा सके। गरीब और विकासशील देशों में आपूर्ति श्रृंखला टूटने का खतरा सबसे ज्यादा मंडरा रहा है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य कार्यक्रम के अधिकारियों का कहना है कि यदि समय रहते एहतियाती कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है और भुखमरी के आंकड़े रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएंगे।
मौसम विभाग की कड़ी नजर और प्रशासनिक तैयारियां
भारत में मौसम विभाग यानी आईएमडी लगातार तापमान और हवा के दबाव पर पैनी नजर रखे हुए है। हालांकि अधिकारी अभी स्थिति की पूरी समीक्षा कर रहे हैं, लेकिन शुरुआती संकेत अच्छे नहीं मिल रहे हैं। देश के कई राज्यों में इस बार तापमान सामान्य से काफी ऊपर दर्ज किया गया है, जो एल नीनो के सक्रिय होने का स्पष्ट संकेत है। राज्य सरकारों को भी केंद्र की तरफ से निर्देश दिए गए हैं कि वे सूखे से निपटने के लिए अपनी कार्ययोजना तैयार रखें ताकि ऐन वक्त पर अफरा-तफरी का माहौल न बने।
आम जनता के लिए आने वाले कुछ महीने बहुत चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं। बिजली की मांग बढ़ने से पावर ग्रिड पर दबाव आएगा और पानी की किल्लत भी गांवों से लेकर शहरों तक सिर उठा सकती है। 'द फ्रीलान्स' की इस जमीनी पड़ताल में यह बात साफ हो गई है कि जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर की कौड़ी नहीं, बल्कि हमारे दरवाजे पर खड़ी एक बहुत बड़ी आपदा है। सरकार और आम नागरिकों दोनों को ही अब पानी बचाने और खाद्यान्न की बर्बादी रोकने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे, अन्यथा आने वाला समय बहुत कठिन होने वाला है।
ग्लोबल वार्मिंग और मौसम के बदलते तेवर का सच
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग ने एल नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं को और अधिक आक्रामक बना दिया है। पहले इस तरह के चक्रों के बीच कुछ वर्षों का अंतराल होता था, लेकिन अब इनकी बारंबारता और तीव्रता दोनों बढ़ गई हैं। इसका मतलब है कि प्रकृति को संभलने का पूरा मौका नहीं मिल रहा है और एक आपदा के खत्म होने से पहले ही दूसरी आपदा दस्तक दे देती है। आम जनता को अब इन बदलते हालातों के हिसाब से अपनी जीवनशैली और खेती के तरीकों में बड़े बदलाव करने ही होंगे।







