नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के कृषि बाजारों और मंडियों में इन दिनों धान की आवक तेजी से बढ़ रही है। किसानों ने अपनी फसल की कटाई पूरी कर ली है और वे इसे बेचने के लिए मंडियों का रुख कर रहे हैं। लेकिन कई बड़े राज्यों में धान के सुरक्षित भंडारण यानी 'धान्या निल्वा' की भारी कमी साफ दिखाई दे रही है। गोदामों में पहले से ही अनाज भरा हुआ है और नया माल रखने के लिए जगह कम पड़ रही है।
स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर भारत और दक्षिण भारत के कई प्रमुख कृषि जिलों में सरकारी खरीद केंद्र अपनी क्षमता से अधिक काम कर रहे हैं। खुले आसमान के नीचे तिरपाल के सहारे रखे गए धान के बोरे मौसम की मार झेल रहे हैं। किसानों का कहना है कि अगर समय पर उठान नहीं हुआ तो उनकी महीनों की मेहनत पानी में मिल जाएगी। नमी बढ़ने से धान की गुणवत्ता पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
खुले में रखा धान और बारिश का खतरा
मंडियों का जायजा लेने पर पता चलता है कि जगह की कमी के कारण ट्रकों और ट्रैक्टरों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। किसानों को अपनी बारी का इंतजार करने के लिए कई-कई दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। खुले मैदानों में बोरियों के ढेर लगे हैं और अचानक होने वाली बारिश इन किसानों की रातों की नींद उड़ा रही है। प्रशासन ने हालांकि त्वरित खरीद के आदेश दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर रफ्तार अभी भी काफी धीमी है।
भारतीय खाद्य निगम और राज्य की एजेंसियों के अधिकारी हालात पर पैनी नजर रखे हुए हैं। गोदामों की कमी को पूरा करने के लिए निजी गोदामों और साइलो को भी किराए पर लिया जा रहा है। अधिकारियों का दावा है कि आने वाले कुछ दिनों में स्थिति में सुधार होगा और गोदामों से अनाज को सुरक्षित स्थानों पर भेजने का काम तेज किया जाएगा। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर अभी भी बहुत काम किया जाना बाकी है।
किसानों की चिंता और मंडियों में हालात
अन्नदाता कहे जाने वाले ये किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ जहां उन्हें अच्छी पैदावार की खुशी है, वहीं दूसरी तरफ उसे सही कीमत पर सुरक्षित रखने की चिंता सता रही है। कई जगहों पर बिचौलियों द्वारा कम दाम पर फसल खरीदने की कोशिशों की खबरें भी सामने आ रही हैं। किसानों की मांग है कि सरकार तुरंत प्रभाव से धान का उठाव करे और उन्हें हरसंभव सहायता प्रदान करे।
स्थानीय किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ तो वे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर सकते हैं। उनका कहना है कि हर साल कटाई के समय यही पुरानी समस्याएं सामने आती हैं और प्रशासन स्थायी समाधान निकालने में असफल साबित होता है। इस बार भी समय रहते पुख्ता इंतजाम न किए जाने से अन्नदाताओं में भारी रोष व्याप्त है।
भविष्य की रणनीति और प्रशासनिक कदम
इस पूरे मामले पर खाद्य और कृषि मंत्रालय ने राज्यों के साथ आपात बैठकें शुरू कर दी हैं। आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से गोदाम बनाने और डिजिटल तकनीक के जरिए भंडारण क्षमता की निगरानी करने की योजना पर भी विचार चल रहा है। 'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि जब तक जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार और सुस्ती खत्म नहीं होगी, तब तक किसानों की इन समस्याओं का स्थाई हल मिलना मुश्किल है।








