नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश इस समय मौसम के एक खतरनाक चक्र से गुजरने की तैयारी कर रहा है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार भारत को मौसम की दोहरी मार झेलनी पड़ेगी। एक तरफ मानसून की बेरुखी और दूसरी तरफ सुपर अल नीनो के असर से हालात बिगड़ सकते हैं। इस साल सर्दियों का पूरा मजा किरकिरा होने की पूरी आशंका जताई जा रही है। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ने वाला है।
प्रशांत महासागर में तापमान तेजी से बढ़ रहा है जो अल नीनो के सक्रिय होने का साफ संकेत है। जब यह स्थिति बहुत ज्यादा गंभीर हो जाती है, तब इसे सुपर अल नीनो कहा जाता है। इसका सीधा असर भारत के मौसम चक्र पर पड़ता है। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण तक सर्दियों के महीनों में तापमान सामान्य से ऊपर दर्ज किया जा सकता है। इससे पारंपरिक ठंड का अहसास कम हो जाएगा और लोगों को अजीब सी उमस भरी सर्दी का सामना करना पड़ेगा।
खेती किसानी और फसलों पर मंडराता बड़ा संकट
मौसम के इस असामान्य मिजाज से देश के अन्नदाताओं की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। रबी की फसलों को जो ठंड और पाला चाहिए होता है, वह इस बार समय पर नहीं मिल पाएगा। गेहूं और सरसों जैसी फसलों की पैदावार पर इसका बुरा असर पड़ सकता है। खेतों में नमी की कमी से किसानों को सिंचाई के लिए ज्यादा मेहनत करनी होगी। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तापमान इसी तरह बना रहा तो बाजार में सब्जियों के दाम भी आसमान छू सकते हैं।
दूसरी तरफ शहरी इलाकों में भी इस बदले मौसम के साइड इफेक्ट दिखने शुरू हो गए हैं। अचानक तापमान में उतार-चढ़ाव से वायरल संक्रमण और मौसमी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। अस्पतालों में सर्दी, खांसी और बुखार के मरीजों की संख्या में अचानक इजाफा दर्ज किया गया है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों को इस बदलते मौसम में अपनी सेहत का विशेष ख्याल रखने की सलाह दी जा रही है। डॉक्टर मान रहे हैं कि कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए यह सर्दी काफी भारी साबित हो सकती है।
प्रशासनिक तैयारियां और आपदा प्रबंधन की चुनौतियां
प्रशासनिक स्तर पर भी मौसम के इस नए मिजाज को लेकर हलचल तेज हो गई है। मौसम विभाग लगातार उपग्रहों के जरिए पैनी नजर रखे हुए हैं ताकि समय रहते सटीक चेतावनी जारी की जा सके। हालांकि, गोरखपुर जैसे स्थानीय इलाकों में विकास और बुनियादी सुविधाओं के मोर्चे पर अभी भी कई कमियां नजर आती हैं। जहां एक तरफ जुहू चौपाटी जैसी योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं, वहीं सुमेर सागर जैसे जल स्रोत कूड़े के ढेर में तब्दील हो रहे हैं।
स्थानीय निकायों की यह लापरवाही आने वाले दिनों में जलभराव और प्रदूषण की समस्या को और गंभीर बना सकती है। मौसम की मार के साथ-साथ अगर स्थानीय स्तर पर साफ-सफाई और ड्रेनेज का हाल ऐसा ही रहा तो आम जनता का जीना मुहाल हो जाएगा। प्रशासन को अब कागजी दावों से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे। लोगों को भी पानी बचाने और पर्यावरण के प्रति जागरूक होने की सख्त जरूरत है।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और आगे का अनुमान
हमारी टीम ने जब मैदानी इलाकों का दौरा किया तो पाया कि आम आदमी अभी से इस आसन्न संकट को लेकर आशंकित है। महंगाई और बिगड़ते मौसम की दोहरी मार ने मध्यम और गरीब परिवार की कमर तोड़ दी है। जानकारों का कहना है कि आने वाले तीन से चार महीने मौसम के लिहाज से काफी उतार-चढ़ाव वाले होंगे। ग्लोबल वार्मिंग का असर अब साफ तौर पर हमारे त्योहारों और जीवन शैली पर दिखने लगा है।








