स्टॉकहोम में रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कारों का ऐलान कर दिया गया है। इस साल यह प्रतिष्ठित सम्मान वैज्ञानिक हेनरी बी कगन और केंसो सोई को दिया जाएगा। दोनों वैज्ञानिकों ने अपनी खोज से विज्ञान की दुनिया में एक नया इतिहास रच दिया है। उन्होंने ऑटोकैटलिसिस यानी स्व-उत्प्रेरण की खोज की है। इस खोज ने विज्ञान के क्षेत्र में सौ साल से चली आ रही एक बड़ी पहेली को सुलझा दिया है। नोबेल समिति ने उनके इस काम को मानवता के लिए बेहद खास बताया है।
यह खोज जीवन के मूल रसायन को समझने में बहुत मददगार साबित होगी। हमारे शरीर और प्रकृति में कई ऐसी प्रक्रियाएं होती हैं जो अपने आप चलती हैं। वैज्ञानिक लंबे समय से यह जानना चाहते थे कि यह सब कैसे होता है। हेनरी कगन और केंसो सोई ने इसी गुत्थी को अपने प्रयोगों से हल किया है। उनकी इस मेहनत से भविष्य में नई दवाइयां और उन्नत सामग्रियां बनाने का रास्ता साफ हो गया है। इस सम्मान के मिलने के बाद पूरी दुनिया के वैज्ञानिक उनकी तारीफ कर रहे हैं।
95 साल की उम्र में मिला यह बड़ा सम्मान
इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेताओं में एक नाम ऐसा है जिसने सबका ध्यान खींचा है। इस खोज से जुड़े वैज्ञानिकों की उम्र और उनके लंबे संघर्ष की भी काफी चर्चा हो रही है। विज्ञान के क्षेत्र में उम्र कभी बाधा नहीं बनती, यह बात इस बार फिर साबित हो गई है। दशकों की मेहनत के बाद इन वैज्ञानिकों को यह मुकाम मिला है। उनके साथी शोधकर्ताओं का कहना है कि यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। इसके पीछे बरसों की प्रयोगशाला की मेहनत और पक्का इरादा छिपा है।
इन वैज्ञानिकों ने अपने काम के जरिए दिखाया कि लगन हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है। उन्होंने अपने प्रयोगों से यह साबित किया कि रसायन विज्ञान में अभी बहुत कुछ ऐसा है जो छिपा हुआ है। उनकी इस खोज पर दुनियाभर के विश्वविद्यालयों में चर्चा हो रही है। युवा छात्र और शोधार्थी इन वैज्ञानिकों को अपनी प्रेरणा मान रहे हैं। उनका यह काम आने वाली कई पीढ़ियों तक विज्ञान की किताबों में पढ़ाया जाएगा।
ऑटोकैटलिसिस की खोज और इसके मायने
ऑटोकैटलिसिस वह प्रक्रिया है जिसमें कोई पदार्थ खुद ही रासायनिक प्रतिक्रिया को तेज कर देता है। आसान भाषा में कहें तो यह एक ऐसी चेन है जो अपने आप आगे बढ़ती है। प्रकृति में जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इसे समझने के लिए यह प्रक्रिया बहुत जरूरी है। केंसो सोई और हेनरी कगन ने इसी प्रक्रिया के बारीक पहलुओं को दुनिया के सामने रखा है। उनके इस मॉडल ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की है कि कैसे साधारण अणु मिलकर जटिल जीवन बनाते हैं।
इस खोज का असर केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में इसका उपयोग दवा निर्माण और केमिकल इंडस्ट्री में भारी पैमाने पर होगा। उद्योग जगत के जानकारों का मानना है कि इससे उत्पादन की लागत कम होगी। साथ ही पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना नए रसायन बनाए जा सकेंगे। भारत समेत दुनिया भर के वैज्ञानिक इस नई तकनीक को अपने यहां आजमाने की तैयारी कर रहे हैं।
विज्ञान जगत में खुशी की लहर
नोबेल पुरस्कार के ऐलान के बाद से ही विज्ञान जगत में जश्न का माहौल है। भारत के भी कई बड़े संस्थानों के वैज्ञानिकों ने इस जोड़ी को बधाई दी है। उनका कहना है कि इस खोज से विज्ञान को एक नई दिशा मिली है। नोबेल समिति का यह फैसला बिल्कुल सही समय पर आया है। आने वाले दिसंबर महीने में एक भव्य समारोह में इन दोनों दिग्गजों को यह पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।
आम लोगों के बीच भी इस खबर को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही है। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर यह खोज हमारे दैनिक जीवन को कैसे प्रभावित करेगी। वैज्ञानिक अब इस बात पर काम कर रहे हैं कि इस तकनीक का लाभ आम आदमी तक कैसे पहुंचे। कुल मिलाकर यह साल रसायन विज्ञान के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो गया है।



