नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — स्टॉकहोम से आई एक बड़ी खबर के मुताबिक इस साल का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दो दिग्गज वैज्ञानिकों को दिया गया है। वैज्ञानिक हेनरी बी कागन और केंसो सोई को इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया है। इन दोनों वैज्ञानिकों ने विज्ञान की दुनिया में एक बहुत बड़ा कारनामा किया है। इन्होंने रसायन विज्ञान की एक ऐसी गुत्थी को सुलझाया है जो पिछले सौ सालों से वैज्ञानिकों के लिए सिरदर्द बनी हुई थी। इस खोज से पूरी दुनिया के वैज्ञानिक हैरान और बेहद खुश हैं।
नोबेल कमेटी के मुताबिक दोनों वैज्ञानिकों ने ऑटोकैटलिसिस के क्षेत्र में बहुत ही शानदार काम किया है। ऑटोकैटलिसिस एक ऐसी प्रक्रिया होती है जिसमें कोई पदार्थ खुद अपनी ही प्रतिक्रिया को तेज कर देता है। इस खोज का सीधा संबंध हमारे जीवन की मूल संरचना और रसायनों से है। धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई और जैविक अणु कैसे बने, इस बारे में वैज्ञानिक लंबे समय से पशोपेश में थे। इन दोनों वैज्ञानिकों के अध्ययन ने जीवन के रसायन से जुड़े इस पुराने रहस्य से पर्दा उठा दिया है।
ऑटोकैटलिसिस की खोज और इसका महत्व
वैज्ञानिकों का कहना है कि हेनरी बी कागन और केंसो सोई की यह खोज आने वाले समय में कई बड़े बदलाव लेकर आएगी। जब हम किसी प्रयोगशाला में रसायन बनाते हैं, तो कई बार अणु दो अलग रूपों में बनते हैं जो देखने में एक जैसे होते हैं लेकिन उनके गुण अलग होते हैं। इसे काइरल समरूपता भी कहा जाता है। प्रकृति में जीवन हमेशा एक ही रूप वाले अणुओं को चुनता है। इस रहस्य को सुलझाने में केंसो सोई और हेनरी कागन का काम मील का पत्थर साबित हुआ है।
इस खोज के बाद अब दवाइयों के निर्माण और आधुनिक रसायन विज्ञान में बहुत आसानी होगी। कई बार दवाइयों के गलत रूप शरीर पर बुरा असर डालते हैं। इस नई तकनीक की मदद से वैज्ञानिक अब बिल्कुल सटीक और शुद्ध दवाइयां बना सकेंगे। मेडिकल और फार्मा सेक्टर के जानकारों का मानना है कि इस खोज से आने वाले दिनों में नई दवाओं के रिसर्च का रास्ता और ज्यादा साफ हो जाएगा। पूरी दुनिया के रिसर्च सेंटर इस सफलता के बाद अब आगे के प्रयोगों पर तेजी से काम कर रहे हैं।
सौ साल पुरानी पहेली का हुआ अंत
यह पूरा मामला सिर्फ एक प्रयोगशाला का प्रयोग नहीं है बल्कि यह ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति से जुड़ा है। वैज्ञानिक पिछले एक सदी से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि प्रकृति ने केवल एक ही प्रकार के अणुओं को क्यों चुना। हेनरी कागन और केंसो सोई ने अपने प्रयोगों से यह साबित कर दिखाया कि ऑटोकैटलिसिस के जरिए यह सब कैसे संभव हुआ। उनकी इस रिसर्च को दुनिया भर की विज्ञान पत्रिकाओं में सराहा गया है और इसे सदी की सबसे बड़ी खोजों में गिना जा रहा है।
भारत के वैज्ञानिक हलकों में भी इस नोबेल पुरस्कार की चर्चा जोरों पर है। देश के कई बड़े विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के प्रोफेसरों ने दोनों वैज्ञानिकों को बधाई दी है। उनका कहना है कि इस तरह की खोजें नई पीढ़ी के छात्रों को विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से ही इंटरनेट और गूगल पर इन वैज्ञानिकों के बारे में सबसे ज्यादा खोजा जा रहा है।
भविष्य में विज्ञान पर इसका क्या असर होगा
द फ्रीलान्स की ग्राउंड पड़ताल के मुताबिक आने वाले महीनों में इस तकनीक पर आधारित कई नई रिसर्च सामने आएंगी। रसायन विज्ञान के पाठ्यक्रम में भी इस खोज को अब मुख्य रूप से पढ़ाया जाएगा। छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह एक बहुत बड़ा विषय बन गया है। नोबेल पुरस्कार के ऐलान के साथ ही यह साफ हो गया है कि मौलिक विज्ञान में किए गए काम कभी बेकार नहीं जाते। दशकों की मेहनत के बाद आज इन वैज्ञानिकों को दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान मिला है जो हर शोध करने वाले के लिए एक मिसाल है।



