नई दिल्ली और देहरादून से हमारी विशेष ग्राउंड रिपोर्ट — अंकिता भंडारी मर्डर केस में न्याय की लड़ाई अब दिल्ली तक पहुंच गई है। राजधानी के इंडिया गेट पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने अंकिता के माता-पिता से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान पीड़ित परिवार ने अपनी पीड़ा साझा की और सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए। परिवार का आरोप है कि उत्तराखंड सरकार मामले से जुड़े अहम सबूतों को मिटाने की कोशिश कर रही है। माता-पिता ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के बाहर फूट-फूटकर रोते हुए अपनी बात रखी और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई से कराने की पुरजोर मांग की है।
इस बीच, अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी ने प्रेस के सामने आकर पांच सूत्रीय मांगें रखी हैं। इन मांगों में मुख्य रूप से वीआईपी का नाम उजागर करने और दोषियों को फांसी की सजा देने की बात शामिल है। पीड़ित परिवार का यह भी कहना है कि वे इस लड़ाई को किसी भी कीमत पर रुकने नहीं देंगे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने परिवार को पूरा भरोसा दिलाया है कि न्याय की यह लड़ाई न तो कभी दबेगी और न ही रुकेगी। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि वे इस दुख की घड़ी में पूरी मजबूती के साथ पीड़ित परिवार के साथ खड़े हैं और हर संभव मदद करेंगे।
उत्तराखंड बंद का आह्वान और जनता का गुस्सा
मामले की गंभीरता को देखते हुए आगामी 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का बड़ा आह्वान किया गया है। अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी ने राज्य की जनता से अपील की है कि वे इस बंद में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें ताकि सरकार पर दबाव बनाया जा सके। यह अपील सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर तेजी से फैल रही है, जिससे लोगों में सरकार के खिलाफ गुस्सा साफ देखा जा सकता है। उत्तराखंड के आम नागरिक और विभिन्न सामाजिक संगठन इस बंद के समर्थन में आगे आ रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक अंकिता को पूरा न्याय नहीं मिल जाता, तब तक उनका विरोध प्रदर्शन इसी तरह जारी रहेगा।
दूसरी ओर, इस राजनीतिक और सामाजिक हलचल के बीच राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर भी विवाद गरमा गया है। हाल ही में भाजपा द्वारा की गई कुछ नियुक्तियों, खासकर दुष्यंत गौतम की नियुक्ति से पीड़ित परिवार और स्थानीय लोग खासे नाराज हैं। परिजनों का कहना है कि एक तरफ वे बेटी के लिए न्याय मांग रहे हैं और दूसरी तरफ विवादित चेहरों को पदों पर बैठाया जा रहा है। इस बात को लेकर जनता में प्रशासन और सत्ता पक्ष के प्रति गहरी नाराजगी बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आरोपियों को बचाने के लिए राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल किया जा रहा है।
दिल्ली में प्रदर्शन और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
अंकिता भंडारी मामले को लेकर दिल्ली में भी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। हाल ही में जंतर-मंतर और इंडिया गेट के आसपास प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ मारपीट की घटनाएं भी सामने आई हैं। कुछ हिंदुत्ववादी संगठनों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि वे प्रदर्शनकारियों को क्यों निशाना बना रहे हैं। इन झड़पों के बाद से दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह सतर्क हो गई हैं। प्रदर्शन स्थल पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी तरह की अप्रिय घटना से निपटा जा सके। बावजूद इसके, युवाओं और महिलाओं में अंकिता के लिए न्याय की मांग को लेकर भारी जोश और आक्रोश दिखाई दे रहा है।
स्थानीय स्तर पर ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के गांवों और शहरों में लोग इस घटना को भूला नहीं पा रहे हैं। महिलाओं के सुरक्षा के मुद्दों पर सरकार के दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। लोग खुलकर सड़कों पर उतरने लगे हैं और स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। अंकिता के माता-पिता की आंखों के आंसू और उनकी टूटी हुई आवाज हर संवेदनशील इंसान को झकझोर रही है। अब सबकी निगाहें 11 जनवरी के उत्तराखंड बंद और आगामी अदालती कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन पांच मांगों पर कोई ठोस कदम उठाती है या नहीं।
न्याय की आस में भटकता परिवार और अगला कदम
द फ्रीलान्स की पड़ताल से यह साफ होता है कि यह मामला अब केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह देवभूमि में सुरक्षा, न्याय और राजनीतिक इच्छाशक्ति का बड़ा सवाल बन गया है। परिवार का संघर्ष इस बात का गवाह है कि आम आदमी जब सिस्टम के खिलाफ खड़ा होता है तो उसे कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। राहुल और प्रियंका गांधी के इस मामले में दखल देने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ गया है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि आगामी दिनों में उत्तराखंड सरकार इन गंभीर आरोपों और मांगों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देती है।










