बेंगलुरु/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक में आरक्षण के मुद्दे पर एक बहुत बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए एससी और एसटी यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण बढ़ाने के फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि किसी भी हाल में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को पार नहीं किया जा सकता है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में लंबे समय से कोटे की सीमा को लेकर बहस चल रही थी और कई वर्ग इसे बढ़ाने की लगातार मांग कर रहे थे। द फ्रीलान्स की टीम इस मामले की गहराई से पड़ताल करने के लिए कानूनी विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों से लगातार बात कर रही है।
अदालत के इस फैसले के बाद राज्य की राजनीतिक पार्टियों में हलचल मच गई है। पिछली सरकार ने राज्य में एससी समुदाय का आरक्षण छह प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत और एसटी समुदाय का आरक्षण तीन प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने का बड़ा फैसला लिया था। इसके बाद कुल आरक्षण का दायरा 50 प्रतिशत की तय सीमा से आगे निकल गया था। याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी थी और इसे संविधान के खिलाफ बताया था। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस फैसले को असंवैधानिक करार दिया है और इसे तुरंत प्रभाव से रद्द करने का आदेश दिया है।
पचास प्रतिशत की सीमा क्यों है इतनी जरूरी?
भारतीय न्याय व्यवस्था और संविधान के कई पुराने फैसलों में यह साफ किया गया है कि देश में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। जानकारों का मानना है कि इस सीमा का मकसद समाज के सभी वर्गों के बीच संतुलन बनाए रखना है। जब कर्नाटक सरकार ने कोटे की सीमा को बढ़ाया था, तभी से यह सवाल उठने लगा था कि क्या राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के तय नियमों को बदल सकती हैं। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इसी बात पर जोर दिया है कि कानून का पालन करना सरकार की पहली जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि बिना पुख्ता और ठोस आंकड़ों के आरक्षण की तय सीमा को लांघा नहीं जा सकता है।
इस कानूनी झटके के बाद अब कर्नाटक सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। सरकार के नुमाइंदों का कहना है कि वे इस फैसले की कॉपी का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। इसके बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई पर कोई पक्का फैसला लिया जाएगा। दूसरी तरफ, उन छात्रों और युवाओं में चिंता बढ़ गई है जो बढ़े हुए कोटे के तहत अपनी पढ़ाई और नौकरियों की उम्मीद लगाए बैठे थे। ज़मीनी स्तर पर लोग यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इस फैसले का उनकी आने वाली भर्तियों और परीक्षाओं पर क्या सीधा असर पड़ेगा।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया और आगे की राह
हाई कोर्ट के इस फैसले के आते ही राज्य की राजनीति में बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे सरकार की कानूनी नाकामी बता रहे हैं और कह रहे हैं कि सरकार को पहले ही पता था कि यह फैसला टिक नहीं पाएगा। वहीं, सत्ता पक्ष के नेता यह कह रहे हैं कि वे पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए हरसंभव कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। जरूरत पड़ी तो इस मामले को देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी जा सकती है। आम जनता इस पूरे घटनाक्रम को बहुत ही गौर से देख रही है क्योंकि इसका सीधा असर हजारों युवाओं के भविष्य पर पड़ने वाला है।
द ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी बेंगलुरु से लेकर दूर-दराज के जिलों तक इस फैसले पर चर्चा हो रही है। सरकारी दफ्तरों और विश्वविद्यालयों में लोग यही बात कर रहे हैं कि अब नौकरियों और दाखिलों में आरक्षण का हिसाब कैसे तय होगा। कानूनी जानकारों का यह भी मानना है कि इस मामले का असर देश के दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है जो अपने यहाँ आरक्षण का दायरा बढ़ाने की सोच रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख करती है या फिर कोई नया रास्ता निकालती है।
कानूनी जानकारों की राय और भविष्य का असर
देश के जाने-माने वकीलों और संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि हाई कोर्ट का यह फैसला पूरी तरह से पुराने संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित है। जब तक राज्य सरकारें पुख्ता आंकड़े पेश करके यह साबित नहीं करतीं कि किसी खास वर्ग को विशेष प्रतिनिधित्व की सख्त जरूरत है, तब तक 50 प्रतिशत की दीवार को नहीं तोड़ा जा सकता। कर्नाटक का यह मामला अब देश भर के लिए एक बड़ा उदाहरण बन गया है। ग्राउंड जीरो पर हमारी टीम लगातार नजर बनाए हुए है और जैसे ही सरकार अगला कदम उठाएगी, हम सबसे पहले आप तक सटीक खबर पहुंचाएंगे।






