भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों में कई ऐसे नाम दर्ज हैं, जिन्होंने देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। इनमें एक बड़ा नाम दुर्गा भाभी यानी दुर्गा देवी वोहरा का आता है। अंग्रेजों की हुकूमत में उनका नाम सुनते ही पुलिस अधिकारियों के होश उड़ जाते थे। वे एक ऐसी महिला थीं जिनसे अंग्रेज भी खौफ खाते थे और उन्हें 'मर्दानी' कहकर बुलाते थे। उनका पूरा जीवन देश की आजादी की लड़ाई को समर्पित रहा था।
लाहौर में सांडर्स वध के बाद जब अंग्रेजों ने पूरे शहर की घेराबंदी कर ली थी, तब भगत सिंह को सुरक्षित बाहर निकालना बहुत बड़ा जोखिम था। ऐसे समय में दुर्गा भाभी ने ऐतिहासिक और बेहद खतरनाक कदम उठाया। उन्होंने भगत सिंह को अपना पति बनाया और उनके साथ ट्रेन में बैठकर लाहौर से सीधे कलकत्ता पहुंच गईं। उनके साथ सुखदेव भी एक नौकर के रूप में सफर कर रहे थे। चालाकी से भरे इस नाटक ने ब्रिटिश पुलिस की आंखों में धूल झोंक दी थी और वे किसी को शक करने का मौका नहीं दे पाए थे।
हिमालय की वादियों में खुफिया बम कारखाने
क्रांतिकारी गतिविधियों को गुप्त रखने के लिए दुर्गा भाभी ने बेहद अनोखे ठिकाने चुने थे। इतिहासकारों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों के सुनसान इलाकों में बने शौचालयों और गुप्त कमरों का इस्तेमाल बम बनाने के कारखाने के रूप में किया जाता था। इन दुर्गम जगहों पर ब्रिटिश पुलिस आसानी से नहीं पहुंच सकती थी। वहां बारूद और अन्य विस्फोटक सामग्री इकट्ठा करके बम तैयार किए जाते थे। इन हथियारों का इस्तेमाल देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों के खिलाफ किया जाना था।
दुर्गा भाभी केवल एक नाम नहीं बल्कि क्रांति की एक ऐसी मशाल थीं जो हर भारतीय युवा के दिल में सुलग रही थी। उनके पति भगवती चरण वोहरा भी देश के महान क्रांतिकारी थे, जिनकी एक बम परीक्षण के दौरान रावी नदी के तट पर शहादत हो गई थी। पति की मौत के बाद भी दुर्गा भाभी ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जंग और ज्यादा तेज कर दी और कई भूमिगत क्रांतिकारियों को सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराए।
क्रांति के बाद गुमनामी और संघर्ष भरा जीवन
आजादी मिलने के बाद देश का माहौल बदल गया, लेकिन दुर्गा भाभी का जीवन सादगी और संघर्ष में ही बीता। उन्होंने किसी बड़े पद या सरकारी सम्मान की लालसा कभी नहीं रखी। उन्होंने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में चुपचाप रहकर बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया। उन्होंने एक मोंटेसरी स्कूल खोला और अपनी पहचान छिपाकर सामान्य जीवन व्यतीत किया। देश के लिए सब कुछ कुर्बान करने वाली इस महान वीरांगना को लंबे समय तक वह मान-सम्मान नहीं मिला जिसकी वे असली हकदार थीं।
आज भी जब हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को पलटते हैं तो दुर्गा भाभी का योगदान हर देशवासी के सीने को गर्व से चौड़ा कर देता है। उनकी बहादुरी, सूझबूझ और देशप्रेम की कहानियां आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ी मिसाल हैं। 'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल में यह सामने आया कि ऐसे वीर नायकों के इतिहास को सहेजकर रखना आज के समय में बेहद जरूरी है ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि यह आजादी कितनी मुश्किलों से मिली है।




