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सिलचर निकाय चुनाव में ईवीएम का कोई मुद्दा नहीं, बैलेट पेपर पर भी बुरी तरह हारी कांग्रेस

असम के सिलचर निकाय चुनाव में बैलेट पेपर से हुए मतदान के बाद कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव में कांग्रेस केवल दो सीटों पर सिमट गई, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने बंपर जीत दर्ज करते हुए $3 पर कब्जा जमाया। इस परिणाम के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
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नेशनल डेस्क, द फ्रीलांस
राष्ट्रीय संपादकीय ब्यूरो•7 अक्टूबर 2026 • अपडेटेड•30
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सिलचर निकाय चुनाव में ईवीएम का कोई मुद्दा नहीं, बैलेट पेपर पर भी बुरी तरह हारी कांग्रेस
📷 सिलचर निकाय चुनाव में ईवीएम का कोई मुद्दा नहीं, बैलेट पेपर पर भी बुरी तरह हारी कांग्रेस — मुख्य घटनाक्रमफोटो साभार: रॉयटर्स / एजेंसीज़ / सोशल मीडिया

खबर की बड़ी बातें (Key Highlights)

  • असम के सिलचर निकाय चुनाव में बैलेट पेपर से हुए मतदान के बाद कांग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव में कांग्रेस केवल दो सीटों पर सिमट गई, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने बंपर जीत दर्ज करते हुए $3 पर कब्जा जमाया। इस परिणाम के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
  • इस खबर से जुड़े सभी पहलुओं की जांच और निगरानी संबंधित विभागों द्वारा की जा रही है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार इस घटनाक्रम का आम जनता पर सीधा असर पड़ सकता है।

सिलचर निकाय चुनाव के नतीजों ने देश की राजनीति में एक नए और तीखे विवाद को जन्म दे दिया है। अक्सर चुनाव हारने के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस पार्टी इस बार बैलेट पेपर पर हुए चुनाव में भी बुरी तरह हार गई है। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस पार्टी केवल दो सीटों पर सिमटकर रह गई है। दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए $3 सीटों पर भारी बहुमत के साथ जीत हासिल की है। यह चुनाव परिणाम उन तमाम राजनीतिक बहनों का करारा जवाब माना जा रहा है, जिसमें विपक्षी दल हमेशा से बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग करते रहे हैं।

असम के मुख्यमंत्री ने इस चुनाव परिणाम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि कांग्रेस पार्टी के पास अपनी हार का ठीकरा फोड़ने के लिए अब ईवीएम का बहाना भी नहीं बचा है। मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि कांग्रेस बैलेट पेपर से हुए इस मतदान में भी जनता का भरोसा जीतने में पूरी तरह असफल रही है। धरातल पर जनता ने एक बार फिर विकास के मुद्दों पर भरोसा जताते हुए भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान किया है। चुनावी मैदान में उतरी कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के तमाम नेता इस करारी हार के बाद से पूरी तरह सन्न हैं और उनके पास जनता के इन तीखे सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं बचा है।

सिलचर में बैलेट पेपर पर वोटिंग और जनता का जनादेश

असम के सिलचर इलाके में हुए इन स्थानीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक बैलेट पेपर के जरिए ही संपन्न कराई गई थी। विपक्षी दलों की लंबे समय से यह मांग रही है कि देश में होने वाले हर छोटे-बड़े चुनाव को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जगह दोबारा से बैलेट पेपर पर कराया जाना चाहिए। उनका ऐसा मानना रहा है कि बैलेट पेपर से मतदान होने पर चुनाव निष्पक्ष होते हैं और जनता का वास्तविक जनादेश सामने आता है। लेकिन सिलचर के इन चुनावों ने विपक्षी दलों के इस तर्क की हवा निकाल दी है। बैलेट पेपर से हुए इस मतदान में भी जब जनता ने कांग्रेस को नकार दिया, तो राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि हार का ठीकरा हमेशा मशीनों पर फोड़ना गलत है।

स्थानीय स्तर पर धरातल से मिल रही ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पार्टी अपने लिए कोई ठोस जमीन तैयार नहीं कर पाई थी। जनता के बीच जाकर अपनी नीतियां समझाने में स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह नाकाम साबित हुआ। इसके विपरीत, सत्तारूढ़ दल और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर अपनी योजनाओं और विकास कार्यों का प्रचार किया। नतीजतन, जब मतदान के बक्से खुले और वोटों की गिनती शुरू हुई, तो कांग्रेस की स्थिति बेहद दयनीय पाई गई। मात्र दो सीटों पर जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए यह परिणाम किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं है, क्योंकि वे पारंपरिक मतदान प्रणाली में भी अपनी पकड़ नहीं बचा पाए।

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असम के मुख्यमंत्री का कांग्रेस पर तीखा सियासी हमला

इस चुनाव परिणाम के सामने आने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि अब वे लोग क्या कहेंगे जो हर बार हार का ठीकरा ईवीएम की तकनीकी खामियों पर फोड़ते थे। मुख्यमंत्री ने दो टूक अंदाज में कहा कि इस बार तो चुनाव पूरी तरह से कागजी बैलेट पेपर पर ही हुआ था, फिर भी कांग्रेस पार्टी को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि जनता का विश्वास कांग्रेस के साथ नहीं है और पार्टी का जमीनी जनाधार पूरी तरह से समाप्त हो चुका है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि इस तरह के चुनाव परिणाम विपक्षी दलों की अंदरूनी कलह और सांगठनिक कमजोरी को उजागर करते हैं।

क्षेत्र के आम मतदाताओं से बातचीत करने पर यह बात सामने आई कि लोग विकास, सड़क, पानी और बुनियादी सुविधाओं पर अपना वोट दे रहे थे। मतदाताओं का कहना था कि वे केवल राजनीतिक जुमलों के आधार पर अपना मत नहीं दे सकते, बल्कि उन्हें धरातल पर काम करने वाली सरकार चाहिए। सिलचर के शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने स्थानीय विकास कार्यों को प्रमुखता से आगे रखा था, जिसका सीधा फायदा उन्हें मतदान के दिन मिला। दूसरी तरफ, कांग्रेस के स्थानीय नेता जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में पूरी तरह विफल रहे और चुनाव के अंतिम दिनों तक उनकी रणनीति बेहद कमजोर नजर आई।

भविष्य की राजनीति पर इस परिणाम का गहरा असर

सिलचर निकाय चुनाव के इन नतीजों का असर आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। जब भी देश में भविष्य में चुनाव सुधारों या बैलेट पेपर बनाम ईवीएम की बहस छिड़ेगी, तब इस चुनाव का उदाहरण जरूर दिया जाएगा। यह परिणाम इस बात का आईना है कि चुनावी जीत या हार केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि मतदान किस माध्यम से हो रहा है, बल्कि असली महत्व जनता के बीच पार्टी की पकड़ और उसके काम का होता है। द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से यह साफ हो गया है कि कागजी पर्चियों पर भी जनता ने कांग्रेस को नकार कर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है।

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