नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को लेकर पुलिस का कड़ा रुख सामने आया है। दिल्ली पुलिस ने कई युवा नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से शांति बॉन्ड भरवाया है। इनमें अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे नाम शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि यह कदम कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उठाया गया है। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये लोग अगले एक साल तक किसी भी प्रदर्शन में शामिल नहीं हो पाएंगे। इस कदम के बाद राजधानी के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है।
दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई नई आपराधिक संहिता की धाराओं के तहत की गई है। पहले इसे पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 116 के नाम से जाना जाता था। इस कानून के तहत प्रशासन किसी भी व्यक्ति से शांति बनाए रखने की गारंटी मांग सकता है। अगर पुलिस को लगता है कि किसी व्यक्ति से शांति भंग हो सकती है, तो वह नोटिस भेजती है। इसके बाद कार्यपालक मजिस्ट्रेट के सामने व्यक्ति को पेश होना पड़ता है। वहां उसे एक तय रकम का मुचलका भरना पड़ता है। साथ ही यह वादा करना होता है कि वह इलाके का अमन-चैन नहीं बिगाड़ेगा।
क्या होता है शांति बॉन्ड और पुलिस इसे क्यों भरवाती है?
शांति बॉन्ड असल में एक कानूनी वादा होता है। इसमें व्यक्ति लिखित रूप से यह भरोसा देता है कि वह कोई गैर-कानूनी काम नहीं करेगा। पुलिस अक्सर किसी बड़े त्योहार, चुनाव या बड़े आयोजन से पहले ऐसे बॉन्ड भरवाती है। इसका मुख्य मकसद किसी भी संभावित हंगामे या टकराव को पहले ही रोकना होता है। सीजेपी से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे केवल शांतिपूर्ण धरने की तैयारी कर रहे थे। उनका आरोप है कि पुलिस इस नियम का गलत इस्तेमाल कर रही है। उनका मानना है कि सरकार युवाओं की आवाज को दबाना चाहती है। वहीं पुलिस का पक्ष है कि संसद और लुटियंस दिल्ली के आसपास सुरक्षा का ध्यान रखना सबसे जरूरी काम है।
कानून के जानकारों के मुताबिक बॉन्ड भरने का मतलब यह कतई नहीं है कि व्यक्ति के सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं। भारत का संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने की पूरी आजादी देता है। लेकिन बॉन्ड भरने के बाद उस व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है। अगर कोई व्यक्ति बॉन्ड भरने के बाद किसी ऐसे धरने में जाता है जहां हंगामा हो जाता है, तो उस पर तुरंत गाज गिर सकती है। पुलिस ऐसे मामलों में बिना देर किए एक्शन ले सकती है। इससे कार्यकर्ताओं के लिए सड़कों पर उतरना कानूनी रूप से काफी जोखिम भरा हो जाता है।
अगर तोड़ी गई बॉन्ड की शर्त तो क्या हो सकती है कानूनी कार्रवाई?
इस शांति बॉन्ड की मियाद आमतौर पर छह महीने से लेकर एक साल तक की होती है। इस पूरी अवधि के दौरान पुलिस संबंधित व्यक्ति की हर गतिविधि पर नजर रखती है। अगर वह व्यक्ति किसी ऐसे प्रदर्शन में शामिल होता है जिसकी पुलिस से इजाजत नहीं ली गई थी, तो पुलिस इसे बॉन्ड का उल्लंघन मान सकती है। ऐसा होने पर बॉन्ड में तय की गई मुचलके की पूरी रकम जब्त कर ली जाती है। इसके साथ ही मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को हिरासत में लेकर सीधे जेल भी भेज सकते हैं। यही वजह है कि इसे कानूनी भाषा में 'प्रीवेंटिव एक्शन' या एहतियाती कार्रवाई कहा जाता है।
अभिजीत दीपके और अन्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्हें बिना किसी ठोस वजह के निशाना बनाया गया है। वे देश में बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों पर छात्रों के हक में आवाज उठा रहे थे। कार्यकर्ताओं का तर्क है कि अगर लोकतंत्र में सवाल पूछने पर ऐसे बॉन्ड भरवाए जाएंगे, तो आम आदमी अपनी बात कैसे रखेगा। उन्होंने साफ किया है कि वे इस कदम से डरने वाले नहीं हैं। वहीं दूसरी तरफ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि राजधानी में कानून तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि बिना अनुमति वाले प्रदर्शनों से आम लोगों को भारी परेशानी होती है।
जंतर-मंतर पर धरने की बदलती व्यवस्था और कानूनी चुनौतियां
दिल्ली का जंतर-मंतर पिछले कई दशकों से देश में धरने और प्रदर्शनों का सबसे बड़ा गवाह रहा है। देश के किसी भी कोने में अन्याय होने पर लोग अपनी आवाज उठाने यहीं पहुंचते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में यहां प्रदर्शन करने के नियम बेहद कड़े कर दिए गए हैं। अब किसी भी धरने के लिए पहले से पुलिस की लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है। अनुमति न मिलने पर पुलिस प्रदर्शन स्थल पर बैरिकेड लगाकर लोगों को पहले ही हिरासत में ले लेती है। सीजेपी नेताओं पर बॉन्ड की कार्रवाई इसी कड़े प्रशासनिक रुख की अगली कड़ी मानी जा रही है।
'द फ्रीलान्स' की पड़ताल से साफ है कि यह मामला अब कोर्ट की चौखट तक भी पहुंच सकता है। कई मानवाधिकार वकीलों का मानना है कि केवल प्रदर्शन की आशंका पर बॉन्ड भरवाना अनुचित है। इसे सीधे तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना जा रहा है। वकीलों की टीम इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है, इस पर पूरे देश के छात्र और नागरिक संगठनों की नजरें टिकी हुई हैं।








