नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के पन्नों में कई ऐसे नाम दबे हैं जिनका जिक्र बहुत कम होता है। ऐसी ही एक जांबाज महिला थीं दुर्गा भाभी, जिन्हें इतिहास में दुर्गा देवी बोहरा के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजों के दिलों में उनके नाम का खौफ ऐसा था कि उन्हें भारत की 'मर्दानी' कहा जाता था। हाल ही में गूगल ट्रेंड्स पर उनके जीवन से जुड़े कई अनसुने किस्से फिर से चर्चा में आ गए हैं।
इतिहास के दस्तावेजों के मुताबिक, दुर्गा भाभी ने देश की आजादी के लिए जो किया, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। उनके गुप्त ठिकानों पर क्रांतिकारियों के लिए हथियारों और बमों का इंतजाम होता था। कहा जाता है कि उनके 'हिमालयन टॉयलेट्स' यानी पहाड़ी इलाकों के गुप्त घरों में बम बनाए जाते थे जिनका इस्तेमाल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति की आग भड़काने के लिए किया जाता था।
लाहौर से कलकत्ता तक का वो खतरनाक सफर
सांडर्स की हत्या के बाद जब अंग्रेजों ने लाहौर में चप्पे-चप्पे पर पहरा बिठा दिया था, तब भगत सिंह को सुरक्षित बाहर निकालना सबसे बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में दुर्गा भाभी ने अपनी जान की बाजी लगा दी। उन्होंने भगत सिंह को अपना पति बनाया और एक अंग्रेज अधिकारी की पत्नी का रूप धरकर उन्हें ट्रेन से सुरक्षित कलकत्ता पहुंचाया। इस दुस्साहसिक योजना ने अंग्रेजी पुलिस को पूरी तरह चकमा दे दिया था।
इस मिशन के दौरान दुर्गा भाभी के साथ उनका छोटा सा बच्चा भी था ताकि किसी को शक न हो। ट्रेन के डिब्बे में अंग्रेजी अफसर सफर कर रहे थे और उनके ठीक सामने देश के सबसे बड़े क्रांतिकारी बैठे थे। दुर्गा भाभी ने अपनी असीम हिम्मत और सूझबूझ से इस असंभव दिखने वाले काम को मुमकिन कर दिखाया।
अंग्रेज क्यों मानते थे इस 'मर्दानी' से खौफ?
दुर्गा भाभी सिर्फ क्रांतिकारियों की मददगार नहीं थीं, बल्कि वह खुद एक सक्रिय क्रान्तिकारी थीं। उन्होंने सांडर्स वध के बाद चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के साथ मिलकर कई गुप्त योजनाओं को अंजाम दिया। अंग्रेजों की खुफिया एजेंसियां उनके बारे में सुराग पाने के लिए हमेशा परेशान रहती थीं, लेकिन वह हमेशा पुलिस की गिरफ्त से दूर रहीं।
'द फ्रीलान्स' की इस ग्राउंड पड़ताल में यह बात सामने आई है कि आज की युवा पीढ़ी को ऐसी महान वीरांगनाओं के संघर्ष के बारे में बहुत कम जानकारी है। इतिहास के इन अनछुए अध्यायों को पढ़ना और समझना हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। दुर्गा भाभी का जीवन यह सिखाता है कि देश की आजादी के लिए महिलाओं ने कितनी बड़ी कुर्बानियां दी थीं।
गुमनामी के अंधेरे में बीता अंतिम समय
देश आजाद होने के बाद दुर्गा भाभी ने लाइमलाइट से दूर एक आम जिंदगी चुनी। उन्होंने गाजियाबाद के कमलानगर में एक स्कूल खोला और बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। देश के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाली इस महान वीरांगना ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल बहुत सादगी और गुमनामी में बिताए।
आज जब भी देश के स्वतंत्रता सेनानियों को याद किया जाता है, तो दुर्गा भाभी का नाम सबसे ऊपर आना चाहिए। 'द फ्रीलान्स' की यह रिपोर्ट पाठकों को उनकी बहादुरी और देशप्रेम से रूबरू कराती है, ताकि हम अपनी असली नायिकाओं को कभी न भूलें।



