नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियंक खड़गे ने देश के चुनाव आयोग और देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की कार्यशैली पर सीधा सवाल उठाया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से बयान देते हुए कहा है कि देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त गंभीर मुद्दों के समय जनता और व्यवस्था के बीच से पूरी तरह नदारद दिखाई दे रहे हैं। यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब देश में चुनावी प्रक्रिया और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर लगातार चर्चाओं का दौर चल रहा है।
प्रियंक खड़गे ने मीडिया के सामने खुलकर अपनी बात रखी और कहा कि देश की संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाने में पीछे हट रही हैं। उनका यह बयान सार्वजनिक टीवी रिपोर्ट्स और राजनीतिक हलकों में तेजी से वायरल हो रहा है। कांग्रेस पार्टी और विपक्षी दल लंबे समय से चुनाव आयोग के फैसलों और कामकाज के तरीकों पर सवालिया निशान लगाते आए हैं। खड़गे के इस ताजा बयान ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है और चुनाव आयोग की भूमिका पर नई बहस छिड़ गई है।
संविधान और निष्पक्षता पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल
भारत का चुनाव आयोग देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था है। लेकिन हाल के दिनों में विपक्षी दलों की तरफ से इस संस्था की स्वायत्तता को लेकर लगातार बयानबाजी सामने आ रही है। जानकारों का मानना है कि जब देश के मंत्री स्तर के नेता इस तरह के आरोप लगाते हैं, तो आम जनता के मन में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर शंकाएं पैदा होने लगती हैं। चुनावी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक इस बात पर बहस छिड़ी है कि क्या चुनाव आयोग वर्तमान राजनीतिक माहौल में पूरी तरह से निष्पक्ष होकर काम कर रहा है।
दूसरी तरफ, सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने विपक्ष के इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र निकाय है और वह अपने नियमों के अनुसार पूरी ईमानदारी से काम कर रहा है। विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोप केवल राजनीतिक फायदे के लिए गढ़े जा रहे हैं ताकि जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाया जा सके। सत्ता पक्ष का यह भी तर्क है कि चुनाव आयोग पर इस तरह के दबाव बनाना लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परंपरा नहीं है।
आम जनता और जमीनी स्तर पर क्या है चुनावी माहौल
मैदान पर जब हमारी टीम ने आम लोगों से बात की तो मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ नागरिकों का मानना है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं पर किसी भी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए ताकि लोकतंत्र जिंदा रह सके। वहीं, कुछ लोगों का यह भी सोचना है कि राजनीतिक दलों को अपनी हार का ठीकरा हमेशा निष्पक्ष संस्थाओं के सिर पर नहीं फोड़ना चाहिए। आम मतदाता फिलहाल पूरी स्थिति को बहुत बारीकी से देख रहा है और आने वाले समय में इसके राजनीतिक परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड पड़ताल से साफ है कि चुनाव आयोग और सरकार के बीच की यह तनातनी इतनी आसानी से खत्म होने वाली नहीं है। जैसे-जैसे चुनावी तारीखें नजदीक आएंगी, राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला और अधिक तेज हो सकता है। अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग इन तमाम राजनीतिक बयानों और आरोपों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है और आने वाले दिनों में अपनी कार्यशैली को लेकर क्या कदम उठाता है।








