नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खर्गे ने भारत के चुनाव आयोग यानी ईसीआई की कार्यशैली पर सीधा सवाल खड़ा किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तीखा बयान जारी करते हुए देश के शीर्ष नेतृत्व और चुनाव आयोग के अधिकारियों की चुप्पी पर हैरानी जताई है। प्रियांक खर्गे के इस बयान के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है और विपक्षी दलों को एक नया मुद्दा मिल गया है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर चुनावी तैयारियों और निष्पक्षता को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं। मंत्री प्रियांक खर्गे ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम लेते हुए कहा कि ये सभी लोग अहम मौकों पर गायब नजर आते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए पारदर्शिता बहुत जरूरी है, लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे हैं लगातार सवाल
भारत का चुनाव आयोग हमेशा से एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था रहा है जिसके ऊपर देश में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की बड़ी जिम्मेदारी होती है। लेकिन पिछले कुछ सालों में विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि आयोग की कार्यप्रणाली में वह पारदर्शिता नजर नहीं आती जो पहले हुआ करती थी। प्रियांक खर्गे का यह ताजा बयान उसी पुरानी बहस को एक बार फिर से हवा दे रहा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि देश की जनता जानना चाहती है कि चुनाव से जुड़े अहम फैसलों के दौरान शीर्ष अधिकारी जनता के सामने क्यों नहीं आते हैं।
कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दल लगातार यह मांग करते रहे हैं कि चुनाव आयोग को हर राजनीतिक दल की बात समान रूप से सुननी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए जिससे किसी भी दल को यह न लगे कि सत्ता पक्ष को कोई खास फायदा पहुंचाया जा रहा है। कर्नाटक के मंत्री का यह बयान इसी रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है जिसके जरिए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग दोनों को एक साथ घेरा जा रहा है।
प्रियांक खर्गे के बयान के बाद गरमाई राज्य और केंद्र की सियासत
प्रियांक खर्गे के इस हमले के बाद कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। हालांकि, अभी तक भारतीय जनता पार्टी या चुनाव आयोग की तरफ से इस विशेष बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन माना जा रहा है कि सत्ता पक्ष जल्द ही इसका कड़ा जवाब देगा। भाजपा नेताओं का हमेशा से यह कहना रहा है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और कांग्रेस पार्टी हार के डर से ऐसी संस्थाओं पर बेबुनियाद आरोप लगाती रहती है।
जमीनी स्तर पर आम मतदाता भी इन बहसों को बहुत गौर से देख रहा है। लोकतंत्र के इस दौर में यह बहुत जरूरी है कि चुनाव कराने वाली संस्थाओं की विश्वसनीयता पर कोई आंच न आए। जब देश के जिम्मेदार मंत्री इस तरह के गंभीर सवाल उठाते हैं, तो आम जनता के मन में भी कई तरह के संशय पैदा होने लगते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इस मामले पर क्या रुख अपनाता है और क्या कोई स्पष्टीकरण जारी करता है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख और आगे की राजनीतिक राह
किसी भी मजबूत लोकतंत्र की पहचान उसकी निष्पक्ष संस्थाओं से होती है। भारत के चुनाव आयोग का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न कराए हैं। ऐसे में वर्तमान समय में उठ रहे ये सवाल संस्था की साख को बनाए रखने के लिए गंभीर आत्मविश्लेषण की मांग करते हैं। प्रियांक खर्गे जैसे नेताओं के बयान केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये इस बात का संकेत हैं कि आने वाले चुनावों में पारदशर्ता का मुद्दा सबसे बड़ा रहने वाला है।
द फ्रीलान्स की इस ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद यहीं थमने वाला नहीं है। जैसे-जैसे देश में चुनावी सरगर्मी बढ़ेगी, चुनाव आयोग की भूमिका, उसके फैसले और नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला और भी तेज होता जाएगा। जनता अब यह देखना चाहती है कि राजनीतिक दल और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को किस प्रकार सुरक्षित रखती हैं।




