नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजनीति में एक बार फिर चुनाव आयोग की भूमिका और देश के शीर्ष नेतृत्व पर तीखे सवाल खड़े होने लगे हैं। कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खर्गे ने एक तीखा बयान देते हुए सीधा सवाल पूछा है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और मुख्य चुनाव आयुक्त आखिर जनता के बीच से गायब क्यों नजर आ रहे हैं। द फ्रीलान्स की टीम ने जब इस बयान के बाद की जमीनी हलचल और राजनीतिक गलियारों की सुगबुगाहट को टटोला, तो यह साफ हो गया कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में और तूल पकड़ने वाला है। विपक्षी दलों का यह आरोप है कि संवैधानिक संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी निभाने में कहीं न कहीं पीछे छूट रही हैं।
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब सार्वजनिक मंचों पर और मीडिया के सामने देश की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल पूछे जाने लगे। प्रियांक खर्गे ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान देकर सियासी पारा चढ़ा दिया है कि आम जनता से जुड़े बड़े मुद्दों पर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग सामने क्यों नहीं आ रहे हैं। चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर उठ रहे इन सवालों ने एक बार फिर लोकतंत्र के रखवालों की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोग और राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या चुनावी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी तरह पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ रही हैं या नहीं।
प्रियांक खर्गे के बयानों से गरमाई राज्य और केंद्र की राजनीति
कर्नाटक के कद्दावर नेता और मंत्री प्रियांक खर्गे के इस बयान के बाद राज्य से लेकर राष्ट्रीय राजधानी तक सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं का कहना है कि देश में कई ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं जिन पर सरकार और चुनाव आयोग को खुलकर अपनी बात रखनी चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि बड़े चेहरे और शीर्ष अधिकारी जनता के सवालों के सामने आने से बच रहे हैं। जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं का मानना है कि जब देश की सबसे बड़ी चुनावी संस्था पर उंगलियां उठती हैं, तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जा सकता है।
दूसरी ओर, सत्ता पक्ष के समर्थकों और नेताओं का कहना है कि इस तरह के आरोप पूरी तरह निराधार और राजनीति से प्रेरित हैं। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और वह अपने नियमों के तहत पूरी निष्पक्षता से काम कर रही है। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री लगातार देश के विकास कार्यों और प्रशासनिक बैठकों में व्यस्त हैं, इसलिए उन्हें 'गायब' बताना विरोधियों का एक राजनीतिक एजेंडा मात्र है। प्रशासनिक सूत्रों का भी यह कहना है कि संस्थाएं किसी के दबाव में काम नहीं करतीं और उनका पूरा ध्यान देश में शांतिपूर्ण और निष्पक्ष व्यवस्था बनाए रखने पर ही रहता है।
संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और जनता के बीच बढ़ता अविश्वास
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसकी मजबूत और स्वतंत्र संस्थाओं में छिपी हुई है, जिनमें चुनाव आयोग का स्थान सबसे ऊपर आता है। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में जिस तरह से चुनाव आयोग के फैसलों और कामकाज के तौर-तरीकों पर सवाल उठे हैं, उसने आम आदमी के मन में कई तरह की शंकाएं पैदा कर दी हैं। द फ्रीलान्स के संवाददाताओं ने जब दिल्ली और बेंगलुरु के आम नागरिकों से बात की, तो कई लोगों का यह मानना था कि चुनाव कराने वाली संस्थाओं को किसी भी राजनीतिक दल के प्रभाव से पूरी तरह दूर रहना चाहिए ताकि जनता का भरोसा अडिग बना रहे।
आम जनता का यह भी कहना है कि लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल पूछना है और सरकार या संवैधानिक संस्थाओं का फर्ज है कि वे उन सवालों के स्पष्ट जवाब दें। जब तक दोनों पक्षों के बीच संवादहीनता बनी रहेगी, तब तक इस तरह के विवाद और बयानबाजी थमने का नाम नहीं लेंगे। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इन तमाम आलोचनाओं का किस तरह से जवाब देता है और देश के राजनीतिक दल इस मुद्दे को किस दिशा में लेकर जाते हैं। द फ्रीलान्स इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा और आगे भी आपको पल-पल की सटीक जानकारी देता रहेगा।







