नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — भारत के निर्वाचन आयोग में नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर राजधानी से लेकर राज्यों तक राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। पिछले कुछ महीनों में चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर नागरिकों के मन में कई सवाल उठे हैं। देश का हर नागरिक यह जानना चाहता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे बड़े पहरेदार यानी चुनाव आयोग का मुखिया आखिर कैसे चुना जाता है। जमीनी स्तर पर लोग इस बात पर बहस कर रहे हैं कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए कितनी जरूरी है। पिछले कुछ हफ्तों में गूगल पर भी इस विषय को लेकर सर्च अचानक काफी बढ़ गई है जिससे साफ है कि आम लोग चुनाव प्रक्रिया के बारीकी से जुड़ रहे हैं।
इस पूरे मामले की जड़ में वह नया कानून है जो संसद के पिछले सत्रों में पास हुआ था। नए कानून के आने के बाद से ही चयन समिति की बनावट को लेकर तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह सरकार और राष्ट्रपति के हाथ में होती थी लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव की मांग उठी। विपक्षी दलों और कानून के जानकारों का कहना है कि चयन समिति में निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी है ताकि चुनाव आयोग का काम किसी के दबाव में न आए। आम जनता भी अब यह समझने लगी है कि चुनाव आयोग का मजबूत होना देश के हर एक वोट की ताकत को सुरक्षित रखता है।
चयन प्रक्रिया और नए कानून पर उठ रहे सवाल
नए नियमों के तहत प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री मिलकर चुनाव आयुक्तों के नाम तय करते हैं। इस व्यवस्था पर कई लोगों का मानना है कि इससे सत्ता पक्ष का पलड़ा हमेशा भारी रह सकता है। अदालत में भी इस बात को लेकर कई याचिकाएं डाली गई हैं जिनमें मांग की गई है कि चयन प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए। जानकारों का कहना है कि जब तक चुनाव आयोग के चयन में न्यायपालिका या अन्य स्वतंत्र संस्थाओं की सीधी भूमिका नहीं होगी तब तक लोगों का पूरा भरोसा कायम रखना मुश्किल हो सकता है। आम लोग भी अब चाय की दुकानों और चौपालों पर इस बात की चर्चा करते दिखते हैं कि चुनाव कराने वाली संस्था पर किसी भी तरह का राजनीतिक दबाव नहीं होना चाहिए।
दूसरी तरफ सरकार का पक्ष यह है कि नया कानून व्यवस्था को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए लाया गया है। सरकार का तर्क है कि इससे फाइलें अटकी नहीं रहेंगी और समय पर सही फैसले लिए जा सकेंगे। प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि देश में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं इसलिए निर्वाचन आयोग का सुचारू रूप से चलना बहुत जरूरी है। नए आयुक्तों के कंधों पर देश के करोड़ों मतदाताओं के भरोसे को कायम रखने की बड़ी जिम्मेदारी होती है। जमीनी हकीकत यह है कि आज का जागरूक मतदाता हर एक प्रशासनिक कदम पर बारीक नजर रख रहा है और किसी भी तरह की लापरवाही को आसानी से स्वीकार नहीं करता है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की सबसे बड़ी चुनौती
भारत जैसे विशाल देश में निष्पक्ष चुनाव कराना दुनिया का सबसे बड़ा प्रशासनिक कार्य माना जाता है। बूथों की सुरक्षा से लेकर ईवीएम मशीनों की आवाजाही तक हर काम के लिए एक मजबूत और निडर चुनाव आयोग की जरूरत होती है। जब भी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का समय आता है तो देश की निगाहें दिल्ली के उस दफ्तर पर टिक जाती हैं जहां से पूरे देश की चुनावी चाल तय होती है। स्थानीय स्तर पर युवाओं और पहली बार वोट डालने वाले छात्रों का कहना है कि उन्हें एक ऐसे आयोग की जरूरत है जो पूरी तरह निष्पक्ष होकर काम करे। चुनावों की पवित्रता तभी बच सकती है जब इसे चलाने वाले लोग पूरी तरह बेदाग और स्वतंत्र छवि वाले हों।
आगामी चुनावी दौर को देखते हुए नए चुनाव आयुक्तों की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। राजनीतिक दलों के बीच आपसी खींचतान के बीच आयोग को कई बार कड़े फैसले लेने पड़ते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब चुनाव आयोग ने अपनी ताकत का सही इस्तेमाल किया है तब-तब देश का लोकतंत्र और मजबूत हुआ है। आम जनता आज भी टीएन सेशन जैसे पुराने और कड़क चुनाव आयुक्तों को याद करती है जिन्होंने नियमों का पालन कराने में कोई कोताही नहीं बरती थी। आज की पीढ़ी भी यही चाहती है कि आने वाले समय में निर्वाचन आयोग ऐसा ही मजबूत और अडिग रुख अपनाए रखे ताकि देश की जनता का लोकतंत्र पर अटूट विश्वास बना रहे।
द फ्रीलान्स की अंतिम ग्राउंड पड़ताल और निष्कर्ष
हमारी टीम ने जब दिल्ली से लेकर उत्तर भारत के कई जिलों तक पड़ताल की तो यह साफ हुआ कि लोग अब राजनीति से ज्यादा व्यवस्था की मजबूती देखना चाहते हैं। चुनाव आयोग के फैसलों पर अब सोशल मीडिया से लेकर गांव की बैठकों तक में बहस होती है। यह इस बात का सबूत है कि भारतीय लोकतंत्र अब बहुत परिपक्व हो चुका है और मतदाता अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह सजग हैं। नियुक्ति के इन विवादों के बीच असली जीत तभी होगी जब चुनाव आयोग जमीन पर पूरी तरह निष्पक्ष और निडर नजर आएगा। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि नए चुनाव आयुक्त देश की चुनावी व्यवस्था को कौन सी नई दिशा देते हैं।





