नई दिल्ली/चेन्नई ग्राउंड ब्यूरो — तमिलनाडु के बहुचर्चित परंदूर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के भविष्य पर अब बहुत बड़ा सवालिया निशान लग गया है। आधिकारिक सूत्रों से मिल रहे संकेतों के मुताबिक सरकार इस पूरी योजना को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर रही है। इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए अब तक करीब सत्रह सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जा चुका है। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से इसका विरोध हो रहा था और इसे लेकर कई तरह के कानूनी व व्यावहारिक पेंच भी सामने आए थे।
इस बीच केंद्र सरकार की तरफ से भी इस पूरे मामले पर अहम बयान सामने आया है जिसमें स्पष्ट किया गया है कि तमिलनाडु सरकार की ओर से अभी तक परंदूर एयरपोर्ट को किसी दूसरी जगह पर शिफ्ट करने का आधिकारिक अनुरोध नहीं किया गया है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का लगातार यह कहना रहा है कि जिस जगह पर यह एयरपोर्ट बनाया जा रहा है, वह एक ऐसा इलाका है जो थोड़ी सी बारिश में ही पानी से भर जाता है। एकापुरम और आसपास के गांवों के लोग लंबे समय से इसके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और उनका सवाल था कि ऐसी डूब क्षेत्र वाली जमीन पर भारी विमानों के उतरने के लिए अड्डा कैसे बनाया जा सकता है।
एयरपोर्ट प्रोजेक्ट रद्द होने के बाद अब सिपकॉट पार्क की तैयारी
परंदूर एयरपोर्ट का प्रस्ताव कमजोर पड़ने के तुरंत बाद ही राज्य सरकार ने उस इलाके में नया दांव चल दिया है। सरकार ने एयरपोर्ट की जगह अब वहां पर एक बड़ा सिपकॉट इंडस्ट्रियल पार्क बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सरकारी गजट में हाल ही में एक नया नोटिफिकेशन जारी किया गया है जिसके मुताबिक सिपकॉट मदुरै और आसपास के इलाकों में आठ हेक्टेयर से ज्यादा जमीन का नया अधिग्रहण किया जाएगा। सरकार अब इस इलाके में उद्योगों को बढ़ावा देकर रोजगार के नए रास्ते खोलने की बात कह रही है।
स्थानीय किसानों और ग्रामीणों के लिए यह स्थिति एक बड़े असमंजस वाली बन गई है क्योंकि उनकी उपजाऊ जमीनें पहले ही एयरपोर्ट के नाम पर ली जा चुकी हैं। किसानों का साफ कहना है कि यदि एयरपोर्ट नहीं बन रहा है तो उनकी जमीनों को या तो उन्हें वापस किया जाए या फिर उद्योगों के नाम पर उन्हें कौड़ियों के भाव न लूटा जाए। राजनीतिक गलियारों में भी इस बात को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है और विपक्षी दल सरकार की इस नीति पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं।
राजनीतिक हलचल और स्थानीय ग्रामीणों का कड़ा विरोध
परंदूर और एकापुरम के गांवों में इस समय प्रशासनिक अमले की हलचल बहुत तेज हो गई है। लोग अपने घरों और जमीनों को बचाने के लिए अभी भी कानूनी और सामाजिक स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी तरफ राज्य में चल रही राजनीतिक उठापटक के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता इस मुद्दे पर एक दूसरे को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। यूट्यूबर और राजनीतिक विश्लेषक भी इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार अपनी नजर बनाए हुए हैं और सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं।
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल में यह बात साफ सामने आई है कि प्रशासन भले ही उद्योगों के जरिए विकास के दावे कर रहा हो, लेकिन जमीन गंवा चुके आम लोगों का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ है। सरकार का नया आदेश आने वाले दिनों में क्या रंग लाता है और किसानों को इसका कितना मुआवजा या न्याय मिलता है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल परंदूर की आबोहवा में सन्नाटा भी है और आने वाले बड़े संघर्ष की सुगबुगाहट भी साफ महसूस की जा सकती है।
प्रशासनिक कदम और भविष्य की अनिश्चितता
जिला प्रशासन और औद्योगिक विकास निगम के अधिकारी अब नए इंडस्ट्रियल पार्क के लिए कागजी कार्रवाई पूरी करने में जुट गए हैं। लेकिन जमीन के मालिकों के मन में अभी भी डर और आशंकाएं बनी हुई हैं कि क्या उनकी आजीविका पूरी तरह से छिन जाएगी। पर्यावरणविदों का भी यह मानना है कि जल स्रोतों और झीलों के पास इस तरह के बड़े निर्माण कार्यों से आने वाले समय में बाढ़ जैसी गंभीर आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।
हमारी टीम ने जब मौके पर जाकर हालात का जायजा लिया तो पाया कि लोग अभी भी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि उनकी जमीन का असल मालिक कौन होगा और उन्हें भविष्य में क्या मिलेगा। सरकार की तरफ से कोई भी स्पष्ट और सीधा जवाब अभी तक सामने नहीं आया है जो ग्रामीणों के जख्मों पर मरहम लगा सके। इस पूरी रिपोर्ट से यह साफ होता है कि परंदूर का यह मामला केवल एक एयरपोर्ट या फैक्ट्री का नहीं, बल्कि आम आदमी के हक और हुकूक की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है।




