नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश की राजधानी दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवाओं को अचानक बंद किए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। इस पूरे घटनाक्रम में नया मोड़ तब आया जब केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने शीर्ष अदालत में पेश होकर बिना शर्त माफी मांग ली। अदालत की सख्ती के बाद सरकार की तरफ से यह कदम उठाया गया है। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि अदालत के किसी भी आदेश का उल्लंघन जानबूझकर नहीं किया गया था। यह मामला प्रशासनिक स्तर पर कानून व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों के बीच संतुलन से जुड़ा हुआ है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर कड़ा रुख अपनाया था कि इंटरनेट बैन से जुड़े नियमों और पिछली न्यायिक व्यवस्थाओं का पालन किस प्रकार किया गया। गृह सचिव की ओर से दाखिल किए गए जवाब में कहा गया है कि आपातकालीन परिस्थितियों और सुरक्षा कारणों से तत्कालीन कदम उठाए गए थे। हालांकि, प्रक्रियागत कमियों या आदेश के पालन में हुई किसी भी चूक के लिए सरकार ने अदालत से बिना शर्त माफी मांगी है। इस मामले में केवल गृह मंत्रालय ही नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस की तरफ से भी अदालत में अनुपालन का विस्तृत ब्योरा सौंपा गया है।
इंटरनेट बैन पर क्यों घिरे गृह सचिव?
राष्ट्रीय राजधानी में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका के चलते प्रशासन ने कई इलाकों में इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगा दी थी। सोशल मीडिया के जरिए अफवाहों को फैलने से रोकने के लिए यह कदम उठाया गया था, लेकिन इसके कारण आम जनता, छात्रों और कारोबारियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। इंटरनेट सेवाओं के ठप होने से डिजिटल भुगतान और रोजमर्रा के कामकाज पर भी बुरा असर पड़ा था। इसी को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें पूछा गया था कि क्या इंटरनेट पाबंदी के पुराने नियमों का पूरी तरह पालन किया गया था या नहीं।
अदालत की पिछली सुनवाइयों में सरकार से तीखे सवाल पूछे गए थे कि बिना पुख्ता समीक्षा के लंबे समय तक इंटरनेट सेवाओं को कैसे बाधित किया जा सकता है। इन तीखे सवालों और कानूनी दबाव के बाद ही गृह सचिव को व्यक्तिगत तौर पर मामले में सफाई देनी पड़ी। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि इस माफीनामे के बाद भविष्य में ऐसे कदमों को उठाने से पहले सरकार और अधिक सावधानी बरतेगी। अधिकारियों का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन साथ ही अदालती निर्देशों का पालन करना भी उतना ही अनिवार्य है।
पुलिस ने भी सौंपा अनुपालन का ब्योरा
गृह मंत्रालय के साथ-साथ दिल्ली पुलिस ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल कर दी है। पुलिस रिपोर्ट में बताया गया है कि किस क्षेत्र में कितने समय के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं और इसके पीछे क्या जमीनी कारण थे। पुलिस अधिकारियों ने अदालत को समझाया कि भीड़ को नियंत्रित करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाली पोस्ट्स को रोकने के लिए यह कदम उठाना मजबूरी बन गया था। हालांकि, अदालत यह परख रही है कि क्या यह पाबंदी जरूरत से ज्यादा थी या आनुपातिक रूप से सही थी।
आम नागरिकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि इंटरनेट बंद करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आखिरी विकल्प होना चाहिए। बार-बार इस तरह की पाबंदियां लगाने से लोगों के सूचना पाने के अधिकार पर सीधा असर पड़ता है। 'द फ्रीलान्स' की पड़ताल के मुताबिक, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई बेहद अहम होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि भविष्य के लिए क्या मानक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
बिना शर्त माफी से आगे की कानूनी दिशा
गृह सचिव द्वारा बिना शर्त माफी मांगे जाने के बाद अब कानूनी जानकारों की नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को कैसे बंद करता है। अदालत पहले भी कह चुकी है कि डिजिटल युग में इंटरनेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि रोजी-रोटी और संवाद का मुख्य जरिया बन चुका है। ऐसे में बिना ठोस आधार के इसे रोकना सीधा नागरिकों के अधिकारों का हनन है। सरकार की तरफ से माफी मांगे जाने से यह संकेत मिलता है कि कार्यपालिका अदालत के दिशा-निर्देशों के प्रति अपनी जवाबदेही मान रही है।
'द फ्रीलान्स' के ग्राउंड रिपोर्टर्स ने पाया कि इस पूरे विवाद ने प्रशासनिक अमले को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच कैसे संतुलन बिठाया जाए। आने वाले दिनों में यह तय हो सकता है कि कानून व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट पाबंदी लगाने के नियमों में और कितनी पारदर्शिता लाई जाएगी। फिलहाल देश की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस माफीनामे को स्वीकार करते हुए क्या अंतिम आदेश जारी करता है।



