नई दिल्ली/ईटानगर — भारत और चीन की सीमा के पास पूर्वोत्तर में एक नया भू-राजनीतिक संघर्ष सुलग रहा है। चीन तिब्बत में दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत बांध बना रहा है। रणनीतिकार इसे भारत के खिलाफ एक संभावित 'वाटर बम' मान रहे हैं। इस चीनी बांध के जरिए भारत की जल आपूर्ति को अचानक मोड़ने या बाढ़ लाने का खतरा पैदा हो सकता है। इसी बड़े खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार ने ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन पर एक भारी-भरकम काउंटर डैम यानी सुरक्षा कवच बनाने का फैसला किया है। लेकिन इस राष्ट्रीय सुरक्षा योजना के सामने एक बड़ी घरेलू चुनौती खड़ी हो गई है। अरुणाचल प्रदेश का प्रमुख आदिवासी समुदाय यानी 'आदि समुदाय' इस परियोजना का कड़ा विरोध कर रहा है।
आदि समुदाय का यह विरोध सिर्फ एक प्रशासनिक असंतोष नहीं है, बल्कि यह उनकी पहचान और अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार उनकी जमीन छीनकर उनकी अनुमति के बिना ऐसे मेगा प्रोजेक्ट थोप रही है। द फ्रीलान्स की ग्राउंड टीम ने जब इस पूरे मामले की पड़ताल की, तो पता चला कि यह संकट बहुत गहरा है। चीन के नापाक मंसूबों को रोकने के लिए भारत सरकार असम और अरुणाचल की सीमा पर पानी रोकने की विशाल संरचनाएं तैयार करना चाहती है। इन योजनाओं के तहत कई बड़े जलाशयों का निर्माण होना है। इन जलाशयों के बनने से स्थानीय गांवों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। यही कारण है कि पहाड़ों पर रहने वाले लोग अब खुलकर सड़कों पर उतर आए हैं।
चीन का वाटर बम और भारत की रणनीतिक मजबूरी
चीन तिब्बत के मेडोग इलाके में ब्रह्मपुत्र नदी पर एक ऐसा महा-बांध बना रहा है, जिसकी क्षमता थ्री गॉरजेस डैम से भी कई गुना ज्यादा है। चीन इस परियोजना के जरिए अरुणाचल और असम के निचले इलाकों पर सीधा नियंत्रण हासिल करना चाहता है। जब भी चीन चाहेगा, वह पानी रोककर सूखा पैदा कर सकता है या अचानक पानी छोड़कर बाढ़ ला सकता है। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। इसी खतरे को बेअसर करने के लिए भारत सरकार ने सियांग नदी पर एक विशाल बहुउद्देशीय बांध बनाने की योजना बनाई है। इस काउंटर प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य चीन द्वारा छोड़े गए पानी के बहाव को नियंत्रित करना और देश के पूर्वोत्तर हिस्से को जल प्रलय से बचाना है।
लेकिन रक्षा विशेषज्ञों की यह रणनीति स्थानीय आदि समुदाय के लिए किसी आपदा से कम नहीं दिख रही है। आदि समुदाय के नेताओं का साफ कहना है कि चीन के खतरे से बचने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है। सियांग नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं है, बल्कि आदि समुदाय की संस्कृति, आस्था और आजीविका का मुख्य केंद्र है। इस नदी के किनारे सदियों से उनकी सभ्यता पलती-बढ़ती आई है। स्थानीय बुजुर्गों का मानना है कि यदि यहां बड़ा बांध बना, तो उनकी पारंपरिक जीवनशैली हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। उनका यह भी तर्क है कि इस निर्माण कार्य से इलाके की नाजुक पारिस्थितिकी और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचेगा। भूकंप के लिहाज से संवेदनशील इस क्षेत्र में इतने बड़े बांध का बनना एक और बड़ी प्राकृतिक त आपदा को बुलावा देना है।
आदि समुदाय की प्रमुख मांगें और सरकार का रुख
आदि समुदाय के लोगों और विभिन्न छात्र संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी जमीन और सियांग नदी पर किसी भी कीमत पर कब्जा नहीं होने देंगे। उनकी मुख्य मांग है कि सरकार इस प्रस्तावित बांध परियोजना को तुरंत और पूरी तरह से रद्द करे। उनका कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आदिवासियों के अधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। समुदाय के प्रतिनिधियों ने यह भी मांग की है कि सरकार को बांध बनाने के बजाय चीन के इस खतरे से निपटने के लिए किसी वैकल्पिक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए। वे अपनी पारंपरिक भूमि पर पूर्ण अधिकार और विस्थापन के किसी भी प्रयास का विरोध करने के अपने संवैधानिक हक पर अडिग हैं।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन के सामने एक बहुत बड़ी दुविधा पैदा हो गई है। एक तरफ देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी तरफ अपने ही देश के नागरिकों का आक्रोश है। सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि यदि समय रहते यह रक्षात्मक उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में चीन के वाटर बम के कारण पूरा पूर्वोत्तर पानी में डूब सकता है। प्रशासन आदि समुदाय के लोगों को समझाने और मनाने की कोशिश में जुटा है। उन्हें मुआवजे और पुनर्वास के तमाम लुभावने प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। लेकिन आदि समुदाय किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं दिख रहा है। अब देखना यह है कि कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के इस चक्रव्यूह में सरकार स्थानीय आदिवासियों को कैसे मना पाती है।
क्षेत्रीय राजनीति और भविष्य की चुनौतियां
इस पूरे विवाद ने पूर्वोत्तर की राजनीति में एक नया भूचाल ला दिया है। स्थानीय क्षेत्रीय दल और विपक्षी नेता इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। आदि समुदाय के समर्थन में कई अन्य जनजातीय समूह भी सामने आ रहे हैं। इससे यह आंदोलन और अधिक व्यापक रूप लेता जा रहा है। सरकार के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है क्योंकि जरा सी लापरवाही से यह मामला देशव्यापी आदिवासी आंदोलन का रूप ले सकता है। सुरक्षा और विकास के इस अंतहीन संघर्ष में आम जनता पिस रही है।
अंततः, भारत को चीन के सामरिक षड्यंत्र का जवाब तो देना ही होगा, लेकिन इसके लिए अपने ही नागरिकों का भरोसा जीतना भी उतना ही जरूरी है। यदि संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद हो जाता है, तो यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक नया मोर्चा खोल सकता है। द फ्रीलान्स की पड़ताल यही बताती है कि जब तक सरकार आदि समुदाय की चिंताओं का कोई ठोस, पारदर्शी और संतोषजनक समाधान नहीं निकालती, तब तक इस वाटर शील्ड प्रोजेक्ट का विरोध थमता हुआ नजर नहीं आएगा।





