नई दिल्ली और चेन्नई — द फ्रीलान्स की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इस समय सहकारी समितियों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। सरकार चाहती है कि गांव और छोटे शहरों के हर व्यक्ति तक बैंकिंग सुविधाएं आसानी से पहुंच सकें। इसी कड़ी में तमिलनाडु सरकार ने एक बहुत बड़ा कदम उठाया है। अब राज्य में चार लाख रुपये तक का कर्ज बिना किसी गारंटी या बंधक के मिल रहा है। महिला समूहों से जुड़े लोगों को भी दस लाख रुपये तक का कर्ज बिना किसी अड़चन के दिया जा रहा है। यह नियम पिछले महीने से लागू हो चुका है और इससे छोटे कारोबारियों को बहुत राहत मिली है।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने ग्रामीण भारत को मजबूत करने के लिए एक लाख करोड़ रुपये का कृषि ढांचागत फंड शुरू किया है। इस पैसे का उपयोग गांवों में गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट बनाने के लिए किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना की शुरुआत करते हुए कहा था कि इससे किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिलेगा। अब बिचौलियों का खेल खत्म हो रहा है और किसान सीधे अपनी उपज को सुरक्षित रख पा रहे हैं। इस फंड से ग्रामीण इलाकों में रोजगार के नए रास्ते भी खुल रहे हैं और युवाओं को अपने ही गांव में काम मिल रहा है।
सहकारी बाजारों से सस्ते दामों पर मिल रहा सामान
आम जनता को महंगाई से राहत दिलाने के लिए अब सहकारी बाजारों की भूमिका भी अहम हो गई है। तमिलनाडु में 'कूप बाजार' नाम से नई व्यवस्था शुरू की गई है। इसके जरिए लोग सीधे सहकारी समितियों द्वारा बनाए गए शुद्ध मसाले, दालें और पहाड़ी उत्पाद खरीद पा रहे हैं। इन दुकानों पर बाजार से कम कीमत पर सामान मिलता है क्योंकि बीच के दलाल हट चुके हैं। महिलाएं इन समितियों के जरिए पापड़, अचार और कपड़े बनाकर बेच रही हैं। इससे उनके घर का खर्च आसानी से चल रहा है और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस साल को सहकारिता वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। मायगोव मंच पर इसके तहत निबंध प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया जिसमें देश के युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस प्रतियोगिता का मुख्य मकसद नई पीढ़ी को यह समझाना था कि मिलजुलकर काम करने से समाज की तस्वीर कैसे बदल सकती है। जब लोग अपनी छोटी-छोटी बचत को एक साथ मिलाते हैं, तो वह एक बड़ी ताकत बन जाती है। यही सहकारिता का असली मंत्र है जो आज गांवों से लेकर शहरों तक दिखाई दे रहा है।
बिना गारंटी के मिलने वाले कर्ज की जमीनी हकीकत
द फ्रीलान्स की टीम ने चेन्नई और आसपास के ग्रामीण इलाकों में जाकर बैंक अधिकारियों और स्थानीय लोगों से बात की। लोगों ने बताया कि पहले बैंक से कर्ज लेना बहुत मुश्किल काम था। जमीन या सोने के कागजात गिरवी रखे बिना कोई भी बैंक लोन देने को तैयार नहीं होता था। लेकिन अब सहकारी बैंकों और सोसायटियों के जरिए स्थिति बदल चुकी है। चार लाख रुपये तक का लोन मिलने से छोटे दर्जी, मोची और दुकानदारों ने अपना काम बढ़ा लिया है। उन्हें ऊंचे ब्याज पर साहूकारों से कर्ज नहीं लेना पड़ रहा है।
प्रशासन का कहना है कि इन योजनाओं की निगरानी कड़ी रखी जा रही है ताकि सही व्यक्ति तक ही मदद पहुंचे। किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकने के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाए गए हैं जहां हर आवेदन की स्थिति देखी जा सकती है। जिन महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से दस लाख रुपये का ऋण लिया है, वे समय पर पैसा चुका भी रही हैं। इससे बैंकों का भरोसा इन समूहों पर और ज्यादा मजबूत हुआ है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने में यह मॉडल एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है।
भविष्य की योजनाएं और किसानों के लिए नए रास्ते
आने वाले महीनों में सरकार सहकारी क्षेत्र को और ज्यादा डिजिटल बनाने की तैयारी कर रही है। देश की सभी पैक्स यानी प्राथमिक कृषि ऋण समितियों को कंप्यूटर से जोड़ा जा रहा है। इससे पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश पूरी तरह खत्म हो जाएगी। किसानों को खाद, बीज और कीटनाशक सीधे इन समितियों से सस्ते दामों पर मिल सकेंगे। द फ्रीलान्स की पड़ताल बताती है कि यदि यह व्यवस्था पूरी ईमानदारी से लागू रही, तो आने वाले कुछ सालों में गांवों की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी और लोगों को शहर की तरफ पलायन नहीं करना पड़ेगा।




