नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश के शिक्षा तंत्र में इन दिनों परीक्षाओं को लेकर बड़ा उथल-पुथल का दौर चल रहा है। एक तरफ मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली नीट परीक्षा को पूरी तरह से बंद करने की मांग जोर पकड़ रही है। वहीं दूसरी तरफ शिक्षक बनने की चाह रखने वाले लाखों युवा सीटेट परीक्षा की तारीखों और करेक्शन विंडो को लेकर परेशान हैं। सही शब्द, तेज समझ और स्पष्ट सोच की बात करने वाले इस दौर में, छात्रों का भविष्य अनिश्चितता के बादलों के बीच घिरा हुआ नजर आता है। मैदान से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इन दोनों बड़ी परीक्षाओं को लेकर चर्चाएं गर्म हैं और हर कोई अपने स्तर पर सरकार से ठोस जवाब मांग रहा है।
दक्षिण भारत से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक नीट परीक्षा के विरोध में आवाजें तेज हो गई हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलापति विजय और अभिनेता से नेता बने कमल हासन ने इस परीक्षा प्रणाली के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है। उनका कहना है कि इस परीक्षा व्यवस्था की वजह से लाखों गरीब और मध्यम वर्गीय छात्रों के सपने बीच में ही टूट जाते हैं। दिल्ली में हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है। नेताओं का साफ कहना है कि इस तरह की प्रवेश परीक्षाएं छात्रों पर मानसिक दबाव बनाती हैं और न्यायोचित व्यवस्था के नाम पर ग्रामीण इलाकों के बच्चों के साथ अन्याय करती हैं।
नीट परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह खत्म करने की उठी मांग
तमिलनाडु के राजनीतिक हल्के में नीट का विरोध कोई नया मामला नहीं है, लेकिन अब यह मांग और ज्यादा आक्रामक हो गई है। मुख्यमंत्री थलापति विजय ने केंद्र सरकार से सीधे अपील की है कि नीट परीक्षा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाए। उनका तर्क है कि यह परीक्षा प्रणाली सिर्फ उन्हीं लोगों के पक्ष में काम करती है जो महंगे कोचिंग संस्थानों की फीस भर सकते हैं। दूसरी तरफ, कमल हासन ने भी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि छात्रों की आत्महत्याओं और उनके सपनों के बिखरने के लिए यह सिस्टम जिम्मेदार है। जमीन पर स्थिति यह है कि छात्र संगठन भी इन नेताओं के सुर में सुर मिलाकर सड़कों पर उतर आए हैं और सरकार पर नीति बदलने का दबाव बना रहे हैं.
इस तीखे राजनीतिक संघर्ष के बीच, स्कूली शिक्षा में जाने वाले युवाओं के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी है। केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी सीटेट को लेकर छात्रों के मन में भारी उलझन बनी हुई है। हाल ही में सीटेट करेक्शन लिंक को एक्टिव किया गया है, जिसके बाद से छात्र लगातार अपनी डिटेल सुधारने में लगे हैं। सोशल मीडिया और तमाम न्यूज प्लेटफॉर्म्स पर इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या परीक्षा तय समय पर होगी या फिर तारीखों में कोई बदलाव किया जाएगा। छात्र यह जानने के लिए बेताब हैं कि क्या 9 अक्टूबर को ही परीक्षा आयोजित की जाएगी या उन्हें तैयारी के लिए थोड़ा और वक्त मिलेगा।
सीटेट परीक्षा की तारीखों और करेक्शन लिंक को लेकर छात्रों में भ्रम
परीक्षा की तैयारियों में जुटे छात्रों का कहना है कि आधिकारिक वेबसाइट पर आने वाले अपडेट्स कई बार इतने उलझे हुए होते हैं कि सही जानकारी जुटाना मुश्किल हो जाता है। करेक्शन विंडो खुलने के बाद से साइबर कैफे और ऑनलाइन पोर्टल्स पर छात्रों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। हर कोई यह सुनिश्चित करना चाहता है कि फॉर्म में कोई गलती न रह जाए, क्योंकि जरा सी चूक उनका पूरा साल बर्बाद कर सकती है। बोर्ड की तरफ से भले ही यह कहा जा रहा है कि सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी कर ली जाएंगी, लेकिन जमीनी स्तर पर छात्रों और उनके अभिभावकों के मन में डर और असमंजस का माहौल साफ तौर पर देखा जा सकता है।
इन तमाम घटनाओं के बीच एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि देश का युवा वर्ग अपनी पढ़ाई और करियर को लेकर बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। चाहे वह मेडिकल में प्रवेश का कड़ा इम्तिहान हो या फिर शिक्षक बनने की पात्रता परीक्षा, हर मोड़ पर छात्रों को संघर्ष करना पड़ रहा है। सही मार्गदर्शन और स्पष्ट नीतियों के अभाव में छात्रों का यह गुस्सा आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है। द फ्रीलान्स की टीम लगातार इन सभी शैक्षणिक गतिविधियों पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए है ताकि पाठकों तक हर एक सच बिल्कुल स्पष्ट रूप से पहुंच सके।
भविष्य की नीतियां और युवाओं की उम्मीदों का सच
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक परीक्षा प्रणालियों में पारदर्शिता और छात्रों के अनुकूल बदलाव नहीं लाए जाएंगे, तब तक इस तरह के विरोध प्रदर्शन थमने वाले नहीं हैं। एक तरफ जहां सरकार अपनी डिजिटल प्रक्रियाओं और समयबद्ध परीक्षाओं का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सरकार नीट के विरोध में उठ रही इन सियासी आवाजों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और सीटेट की तारीखों को लेकर क्या अंतिम मुहर लगती है। देश का हर युवा इस वक्त सिर्फ एक ही उम्मीद लगाए बैठा है कि उसे बिना किसी मानसिक तनाव के अपनी योग्यता साबित करने का निष्पक्ष मौका मिले।







