नई दिल्ली/ग्राउंड ब्यूरो — देश में इस समय एक साथ कई मोर्चों पर बड़े संकट खड़े होते दिख रहे हैं। एक तरफ मौसम का मिजाज देश के बड़े हिस्से पर भारी पड़ रहा है। मानसून के इस दौर में भी बारिश के बाद उमस और गर्मी लोगों का जीना मुहाल कर रही है। मौसम विभाग और स्वास्थ्य रिपोर्टों के मुताबिक, इस जानलेवा उमस और तापमान के मेल से करीब 70 करोड़ लोगों को सीधे तौर पर संकट का सामना करना पड़ सकता है। आम आदमी के लिए घर से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है और कामगारों की सेहत पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है।
इन घरेलू और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर भी सरगर्मी तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देश पाकिस्तान को लेकर एक बार फिर कड़ा संदेश दिया है। सिंधु जल समझौते और पानी के बंटवारे के मुद्दे पर भारत ने अपने रुख को और सख्त कर लिया है। सरकार का साफ कहना है कि देश के हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। पानी और सुरक्षा के इन मुद्दों पर सुरक्षा मामलों की उच्चस्तरीय बैठकों में लगातार मंथन चल रहा है और अधिकारी जमीनी हालात पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।
समुद्री रास्तों पर मंडराता खतरा और तेल की कीमतें
अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत के लिए सप्लाई चेन और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा एक बड़ा सिरदर्द बन गई है। खाड़ी देशों के बीच से गुजरने वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज यानी होर्मुज जलडमरूमध्य से भारत आने वाले जहाजों को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इस अहम समुद्री रास्ते से आने वाले तेल और सामान के जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों के हमलों का खतरा लगातार बना हुआ है। समुद्री जानकारों का कहना है कि इस रास्ते से जहाजों को भारत पहुंचने में काफी दिन लगते हैं। अगर इस रास्ते पर जरा भी रुकावट आती है, तो भारत में ईंधन और जरूरी सामान की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।
सुरक्षा एजेंसियों और नौसेना ने इस संवेदनशील समुद्री मार्ग पर अपनी चौकसी बहुत बढ़ा दी है। भारत की नजर इस बात पर है कि पश्चिम एशिया के हालिया तनाव का असर उसके व्यापारिक जहाजों पर न पड़े। जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नौसेना के युद्धपोतों की तैनाती पर भी विचार किया जा रहा है। देश के भीतर ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार लगातार वैकल्पिक रास्तों और रणनीतिक तेल भंडारों की समीक्षा कर रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति से आसानी से निपटा जा सके।
आम नागरिकों के लिए महंगाई और संसाधनों की बचत की अपील
एक तरफ जहां बाहरी मोर्चों पर तनाव और मौसम की मार है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर संसाधनों के समझदारी से इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। सरकार की ओर से आम नागरिकों से अपील की गई है कि वे पेट्रोल और डीजल की एक-एक बूंद बचाएं। इसके अलावा, सोने के गहनों की बेजा खरीदारी से बचने और देशहित में आर्थिक अनुशासन अपनाने की सलाह भी दी गई है। अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए यह जरूरी माना जा रहा है कि देश का पैसा अनुत्पादक चीजों में न फंसे बल्कि देश के विकास में लगे।
जमीनी स्तर पर आम लोगों के सामने महंगाई और बदलते मौसम की दोहरी मार साफ देखी जा सकती है। किसानों से लेकर आम नौकरीपेशा इंसान तक, हर कोई बढ़ती लागत और मौसम की अनिश्चितता से परेशान है। बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत को अपनी ऊर्जा नीतियों में और कड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। फिलहाल, आम जनता से लेकर नीति निर्माताओं तक सभी की नजरें इन तमाम मोर्चों पर चल रही हलचल और प्रशासनिक फैसलों पर टिकी हुई हैं।
प्रशासनिक तैयारियां और भविष्य की रणनीति
इन तमाम गंभीर मुद्दों से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं। गर्मी और उमस से प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को अलर्ट पर रखा गया है ताकि हीटवेव और बीमारियों से तुरंत निपटा जा सके। जल संकट से जूझ रहे इलाकों में पानी के वैकल्पिक स्रोतों को खंगाला जा रहा है। स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वे राहत कार्यों में किसी भी तरह की कोताही न बरतें और जरूरतमंदों तक समय पर मदद पहुंचाएं।
'द फ्रीलान्स' की ग्राउंड पड़ताल बताती है कि आने वाले हफ्ते देश के लिए कूटनीतिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। मौसम के तेवर और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के हालात पर देश की पैनी नजर है। सरकार का मुख्य जोर इस बात पर है कि देश के आम नागरिकों को किसी भी बड़े संकट से बचाया जा सके और देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर बनी रहे। अधिकारी हर संभावित स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं और पल-पल की रिपोर्ट ली जा रही है।








