नई दिल्ली से ग्राउंड रिपोर्ट — देश की राजधानी में आयोजित सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस यानी सीजेपी की एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उस समय हालात तनावपूर्ण हो गए जब अचानक भारी हंगामा शुरू हो गया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ता के तौर पर शामिल हुईं नेहा बोरा अपना भाषण दे रही थीं कि तभी माहौल अचानक गरमा गया और उनका भाषण बीच में ही रोकना पड़ गया। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों और आयोजकों के बीच तीखी बहस भी देखने को मिली जिससे वहां अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
हंगामे के इस पूरे घटनाक्रम के बीच सीजेपी से जुड़े नेता अभिजीत दीपके ने मीडिया और वहां मौजूद लोगों के सामने खुलकर अपनी बात रखी। अभिजीत दीपके ने कड़े शब्दों में कहा कि देश में आज हालात ऐसे बन चुके हैं जहां असहमति की हर आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है और मौजूदा हुकूमत हर मोर्चे पर तानाशाही रवैया अपना रही है। उनके इस बयान के बाद कार्यक्रम में मौजूद समर्थकों ने जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी।
सीजेपी प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्यों मचा हंगामा?
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य एजेंडा देश में लगातार प्रदर्शन कर रहे समूहों पर हो रही पुलिसिया कार्रवाई और कानूनी बंदिशों पर चर्चा करना था। सीजेपी के नेताओं का कहना है कि सरकार के इशारे पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। नेताओं से प्रदर्शन करने से पहले भारी बॉन्ड भरवाने और उन पर कड़ी शर्तें थोपने के मामलों को लेकर भी तीखा रोष व्यक्त किया गया। आयोजकों का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन निष्पक्षता भूलकर एक पक्षीय कार्रवाई कर रहा है जो सीधे तौर पर संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई को लेकर हुई सुनवाई का हवाला देते हुए वक्ताओं ने कहा कि पुलिस खुद ही अपने मामलों में जज की भूमिका कैसे निभा सकती है। अदालत में चली बहस का जिक्र करते हुए सीजेपी नेताओं ने कहा कि देश की शीर्ष अदालत से उन्हें न्याय की पूरी उम्मीद है। नेताओं ने साफ किया कि प्रशासन की तरफ से कितनी भी पाबंदियां क्यों न लगा दी जाएं, जनता के अधिकारों की लड़ाई को कानूनी और लोकतांत्रिक दायरे में रहकर पूरी मजबूती से लड़ा जाएगा।
नेहा बोरा और अभिजीत दीपके की रणनीति में दिखा स्पष्ट फर्क
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वक्ताओं के तेवर और उनकी कार्यशैली में एक अलग ही अंतर साफ तौर पर देखने को मिला। जहां एक तरफ नेहा बोरा ने पूरी स्थिति को बहुत संयमित और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर रखने की कोशिश की, वहीं दूसरी तरफ अभिजीत दीपके के तेवर बेहद आक्रामक और राजनीतिक रूप से सीधे प्रहार करने वाले रहे। दोनों नेताओं की इस अलग रणनीति को लेकर अब राजनीतिक गलियारों और मीडिया में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि क्या आने वाले दिनों में यह आंदोलन एक नया मोड़ लेगा।
दूसरी ओर, देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता राहुल गांधी भी विपक्षी दलों के तमाम बड़े नेताओं के साथ हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं। चुनाव और चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों तथा वोट चोरी जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है। इन तमाम घटनाओं के एक ही समय पर सामने आने से यह साफ हो गया है कि आने वाले दिनों में केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का दायरा और अधिक बढ़ने वाला है, जिस पर देश की जनता की भी पैनी नजर बनी हुई है।
कानूनी बंदिशों के बीच आगे क्या होगा विरोध प्रदर्शनों का भविष्य?
द फ्रीलान्स की जमीनी पड़ताल बताती है कि सीजेपी और अन्य नागरिक संगठनों के नेताओं को बॉन्ड भरने के लिए मजबूर करने की घटनाओं ने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को चिंता में डाल दिया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह की कानूनी अड़चनों से जमीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शनों की धार को कम करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, नेताओं का कहना है कि वे इन दमनकारी नीतियों के आगे झुकने वाले नहीं हैं और आने वाले समय में देशव्यापी स्तर पर अपने विरोध को और अधिक तेज करेंगे।






